जिद्दू कृष्णमूर्ति की जबानी

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    मन हमेशा ताजा , युवा , अबोध ,ओजस्विता और उमंग से सरोबार हों ।इसके लिए काफ़ी चेतना की जरूरत होगी । तुम्हारे मन में क्या हो रहा है ,यह चेतना । इसी स्थिति में हम कुछ सीखते हैं ।मन में चल रहे भावों को सही और गलत के खाँचों में बाँटने की जरूरत नहीं , क्योंकि ऐसा करने पर हम एक सेन्सर लगा रहे होते हैं । एक यात्रा  , जिसमें धारणाओं , निष्कर्षों ,पूर्वाग्रहों के बोझ के बिना निकलना जरूरी है ।

    अगर तुम्हें लगता है कि खुद के बारे में जानना जरूरी है क्योंकि मैं या और कोई ऐसा कह रहा है तब संवाद ख़त्म हो जाता है । यदि इस बात पर हम सहमत हो जाँए कि अन्तर्मन की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है ,तब हमारा एक अलग नाता होगा – साथ – साथ हम एक  आनन्दमय , सतर्क और समझदार खोज में लगेंगे ।

    मैं तुम्हारा विश्वास नहीं माँग रहा क्योंकि ऐसा करने पर मैं खुद को ऊँचे आसन पर बैठा लूँगा । अपना गुरु और शिष्य तुम्हें खुद होना होगा । मूल्यवान और जरूरी मान कर हम जिन बातों को स्वीकार करते हैं उन सब पर सवाल करने होंगे ।

    किसी का अनुसरण न करने में अकेला-सा महसूस होगा । तब हो जाओ अकेले ।जैसे तुम हो उससे मुखातिब होने पर पता चलेगा कि तुम खाली , मलिन , बोका , कुरूप ,दोषी और व्याकुल हो – एक क्षुद्र , रद्दी ,सेकेण्ड हैन्ड हस्ती हो ।इस हकीकत से मुँह न मोड़ो। मुँह मोड़ते ही भय का आरम्भ होगा ।

    खुद की पड़ताल में हम बाकी दुनिया से खुद को अलग-थलग नहीं कर रहे हैं । यह अस्वस्थ प्रक्रिया नहीं है । दुनिया भर में इन्सान रोजमर्रा की इन्हीं मुश्किलात को झेलता है , जिन्हें हम खुद झेल रहे हैं । इस पड़ताल में कत्तई विक्षिप्तता नहीं है चूँकि व्यक्ति और समूह में फर्क नहीं है । मैं जैसा हूँ , उस हिसाब से मैंने एक दुनिया बनाई है । हम  हिस्से और समग्र की लड़ाई में न खो जाँए ।

3 Responses to “जिद्दू कृष्णमूर्ति की जबानी”


  1. 1 Pratik Pandey June 28, 2007 at 8:25 pm

    बहुत अच्छा उद्धरण है। धन्यवाद।
    वैसे, आपको मालूम ही होगा कि जिद्दू कृष्णमूर्ति समाजवाद और साम्यवाद आदि के ज़रिए बदलाव लाने की कोशिशों को बिल्कुल व्यर्थ मानते थे। :)

  2. 2 shashankshekhar June 28, 2007 at 9:25 pm

    कृष्णमूर्ति के विचारों पर ध्यान दिलाने के लिए धन्यवाद । आशा है आप उनके और विचारों को भी, विशेषकर युवाओं के विषय में, हमारे सामने लायेंगे ।
    शशांक शेखर

  3. 3 serendipidad December 23, 2007 at 6:42 am

    Jiddu Krishnamurti;

    “There are three monks, who had been sitting in deep meditation for many years amidst the Himalayan snow peaks, never speaking a word, in utter silence. One morning, one of the three suddenly speaks up and says, ‘What a lovely morning this is.’ And he falls silent again. Five years of silence pass, when all at once the second monk speaks up and says, ‘But we could do with some rain.’ There is silence among them for another five years, when suddenly the third monk says, ‘Why can’t you two stop chattering?”

    http://www.katinkahesselink.net/kr/jokes.html

    http://jiddukrishnamurti.multiply.com/photos/album/1/Jiddu_Krishnamurti.

    http://seaunaluzparaustedmismo.blogspot.com/


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