महाराष्ट्र में कुछ पति अपनी पत्नी का नाम बदल कर मनपसन्द नाम रख लेते हैं , शादी के बाद, झटके में ।
मीरा जब प्रोफेसर इन्दिरा के यहाँ झाड़ू-पोछा-बरतन-कपड़ा करने पहले-पहल गयी तब उसे बता दिया गया कि उसका नाम मालती रहेगा । प्रो. इन्दिरा के घर में मीरा के पहले काम करने मालती आती थी ।
मन्जू भी मीरा की तरह काशी विश्विद्यालय परिसर में अध्यापकों के घरों में काम करती है । उसका नाम इसलिए बदला गया क्योंकि मालकिन की किसी रिश्तेदार का नाम भी मन्जू था ।
फ्रिजीडेर कम्पनी के रेफ़्रिजरटर का छोटा नाम ‘फ्रिज’ ऐसा चला कि कम्पनी का उत्पाद जहाँ उपलब्ध नहीं है , वहाँ भी रेफ़्रिजरेटर को फ्रिज ही कहा जाता है । भारत में वनस्पति के लिए डालडा और कपड़ा धोने के पाउडर के लिए सर्फ या निरमा चलता है । ओडिसा में मैंने स्टेट्समैन दैनिक मँगवाने के लिए ” इंग्रेजी ‘समाज’ ” माँगते हुए लोगों को सुना है । ‘समाज’ ओडिया का सब से अधिक बिकने वाला दैनिक है ।
व्यक्ति या वस्तु का नाम बदल देना ,उसकी हैसियत पर निर्भर है । हैसियत मजबूत हुई तो अन्य वस्तुओं के साथ उसका नाम जुड़ जाता है । मार्टिन लूथर किंग ,सीज़र शावेज ,लान्ज़ा देल वास्ता , लेच वॉलेसा , नेलसन मण्डेला के साथ ‘गाँधी’ जुड़ गया ।
उत्तर भारत में ईसाई पादरियों द्वारा कार्यक्षेत्र में नाम बदल लेने का चलन व्यापक है । उनके नाम एलेक्स , मैथ्यू , जैसे नामों से बदल कर फ़ादर स्नेहानन्द , फ़ादर आनन्द , फ़ादर विनोद , फ़ादर अनिलदेव , अखिलेश भाई , दिलराज और नीति भाई जैसे नाम रखे जाते हैं ।
स्त्री - पुरुषों के नाम में सिख अभेद करते हैं । हांलाकि ‘सिंह’ या ‘कौर’ द्वारा भेद प्रकट हो जाता है।
भारत में नाम का उत्तरार्ध आम तौर पर जातिसूचक होता है । बिहार आन्दोलन के दौरान कई स्थानों पर कुन्तलों में खुद-से तोड़ी हुई जनेऊ का ढेर लग जाता था । इसके अलावा नाम का उत्तरार्ध हटाने का चलन भी व्यापक हो गया था । कुछ ने बागी ,संग्रामी ,आज़ाद ,इंकलाब,राही , क्रान्ति जैसे पद अपने नामों से जोड़ लिए । महाराष्ट्र में इसी ढंग की चेतना से नाम के साथ माँ और बाप का नाम जोड़ने का रिवाज चला ।
विवाह के बाद पति का जाति नाम धारण करने की प्रचलित परम्परा को तोड़ने के प्रयोग भी हुए हैं । पति का जाति-सूचक नाम न जोड़ने , विवाह-पूर्व का जाति-नाम बरकरार रखने और दोनों जोड़ कर रखने के उदाहरण मिल जाएँगे ।
स्कूल की बाहर रहने वाले बच्चों को पढ़ाते वक्त मैंने पाया कि कई बच्चे अपनी दादी ,नानी , बूआ , चाची ,मामी ,मौसी , और माँ तक का नाम नहीं जानते । औरत की सामाजिक-पारिवारिक हैसियत का द्योतक है , यह ।

बहुत सही कह रहे हैं आप । जब स्त्रियाँ घर से बाहर पढ़ने या काम करने नहीं जाती थीं तब शायद उन्हें नाम का बदलना, विशेषकर जाति नाम बदलना इतना असहज न करता हो, किन्तु आज जब स्त्री की स्वयं की एक पहचान है, तब नाम , जाति नाम आदि बदलना उसे असहज कर देता है । माना नाम कुछ भी हो सकता है उसका महत्व नहीं है , पर उससे व्यक्ति की पहचान तो होती ही
है । और संसार में कौन अपनी पहचान खोना चाहता है ?
घुघूती बासूती
सही लिखा । अब जब स्त्रियाँ बाहर जा रही हैं ,नौकरी कर रही हैं , नाम बदलना , पति का सरनेम जोडना शायद प्रक्टिकल नहीं रहा । जितनी स्त्रियाँ बाहर निकलेंगी ये और कम होता जायेगा । आखिर अफिडेविट वगैरह के चक्कर में कौन पडे । समयानुसार , सुविधानुसार चीज़ें बदलती हैं ।
गरीबों और दलितों के नाम अलग होते हैं जिससे उसे हमेशा अपने कुल का ध्यान रहे, माँ-बाप ठीक नाम रखें तो भी कायथ-बाम्हण बिगाड़ देते थे, बड़ा चले हैं बाबुओं जैसा नाम रखने हुँह
नारायण का नरेना, लक्ष्मण का लछुआ, राम का रमुआ..आदि, यानी भगवान के नाम को बिगाड़ने का पाप भी लेने को तैयार हैं लोग, अपनी एक्सक्लूसिविटी बनाए रखने के लिए…यह तो बिगाड़ने की बात है. गोबरा, ढेलवा, ठेलवा, खेदुआ, चमरा, लेदू, खेदू नाम का कोई सर्वण आपको ढूँढे नहीं मिलेगा, ऐसा नाम माँ-बाप नहीं रखते यह समाज का प्यार से दिया हुआ निकनेम होता है.
आप अपने नाम के बारे में भी कुछ लिखिए सर.
अफ़लातूं.. प्लेटो का अरबी नाम है और प्लेटो ग्रीक दार्शनिक के मूल नाम का अंग्रेज़ी उच्चारण.. सही ग्रीक उच्चारण क्या है.. ये मैं नहीं जानता.. मगर ये सारी बातें आप भी जानते होंगे और अनामदास भी.. और भी कुछ पहलू होंगे जो उघाड़ने के लिए वे कह रहे हैं.. उघाड़ें..
पोस्ट प्यारी है..