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प्रिय चिट्ठेकार अभय त्रिपाठी ने ‘खूबसूरत’-से निर्मल-आनन्द अन्दाज में टोका था, “फिल्मी गीतों का बुझौव्वल ‘शैशव’ पर क्यो देते हो ? ” मुझे लगा उनका बिल्लू जिन दृश्यों के लावण्य से किंकर्तव्य्विमूढ़ हो सकता है तो जरूर फिल्मी गाने भी सुनता होगा ,कभी कदाच हॉल ( गुजरातियों या मालवा के लोग जिसे ‘होल’ कहेंगे । ) में अद्धा टिकट पर आधी फिलम भी देख ली होगी , तो अचरज नहीं । लेकिन अभयजी ने हमें जिस भावना से टोका था उसको बहुत जल्दी नजरअन्दाज कर रहा हूँ ! दुनिया के बच्चे माफ़ करें ।
काहे , भाई ? इसलिए ‘शैशव’ चुना है कि हमारे ‘अप्रिय’ निर्णय वाले प्रिय दोस्त अनूप ने हमे बचकाना कह दिया । सही कहा कि नाराज नहीं होंगे।हम ने कहा कि ऊ औ देबासीस जयपरकास नीयर हैं लेकिन उसको बाबा विनोबे का रोल पसन्द है । बाबो कहते थे , ‘गाँधी ने आजादी की एक व्याख्या की थी - आजादी मतलब ग़लतियाँ करने का हक’ । तब बाबा को करे दो गलती ! त भाई , गलतिया खाली आपै करेंगे ? कोई गलती करेगा तो सुधरेगा भी नहीं ?
ई अप्रिय निर्णय वाला हमारा प्रिय अनूप का ए गो किस्सा सुनिए,बचपन का नहीं ,’छोटी जवानी’ का( १९८५ का होगा) :
प्रौद्योगिकी संस्थान , काशी विश्वविद्यालय के एम टेक. के छात्र अनूप और सांख्यिकी के शोध छात्र हम । छात्रसंघ चुनाव में समता युवजन सभा का उम्मीदवार मैं और प्रौद्योगिकी संस्थान में हम्मे लड़ावे वाला मुख्य साथी लोगन में एक अनूप । आदर्शवादी तरुण ।
सयुस का चुनाव लड़े का ढ़ंग अलग , लड़ावे वाले अलग ढंग के , नारा भी अलगै होता था । दूसरा सब का मोटर साइकिल जुलूस निकले तो हमिनी का साइकिल जुलूस । तब देखा-देखी और लोग भी साइकिल जुलूस का कोसिस किए।बड़ा-बड़ा लाद वाले मनोज सिन्हा ( बाद में सांसद गाजीपुर ) , वीरेन्द्र सिंह जिनको चंचल कुमार वीरेन्द्र सिंह ‘पोतेदार’ कहता था ( इन्दिराजी वाले पोतेदार की नकल में नहीं,’जस नाम तस गुन’ के नाते) आदि । तबका हमहने क साथी ओमपरकसवा ( अभी प्रोफ़ेसर पत्रकारिता , काशी विद्यापीठ) नारा बनाया , ‘सयुस की साइकिल देखी , सबने मोटरसाइकिल फेंकी ‘ । चिढ़ जाँए सब,’सरवा एक तो साइकिल पे चढ़वाया , अब सब मजा ले रहा है ।
पोस्टरवा भी हाथे का बना रहता था । छपलका नहीं । कौनो साथी रमन हॉस्टल(इंजीनियरिंग वाले लैकों के दस में से एक हॉस्टल) के नोटिस बोर्डे पर हमारा पोस्टर साट दिया ।गलत जगह साटा।पोस्टरवा से नोटिस तोपा जाएगी। हॉस्टल में प्रतिक्रिया शुरु हो गई । मैं पहुँचा तो मुझे बुलाकर बन्द कमरे में समझाया गया कि आप खुद अपने हाथ से उसे उखाड़िएगा , दिनवे में । तो भैय्या अपने पोस्टर अपने हाथ से उखड़वाये अनूप और साथी , आपत्तिजनको नहीं था । पोस्टरवा निकाले , माहौल बन गया । इन्जीनियरिंग कॉलेज , दृश्य कला संकाय , महिला महाविद्यालय और चिकित्सा विज्ञान संस्थान में तो एक साल पहिले ही नं १ पर रहे - फिर चँप गया माहौल।
मेरे भाई अनूप ,पोस्टरवा (चिट्ठा की प्रविष्टी) फिर हट चुका ,अबकि आपत्तिजनक था तो माफ़ी भी माँग लिया, लेखक ।अब फिर माहौल काहे नहीं बना पाए ?
शिकायतकर्ता का हाल सुनने के पहले एक कनपुरिया किस्सा और एक कनपुरिया कहावत ।
कानपुर के झकरकटी मोहल्ले में गधैय्या गोल में एक माट साहब थे । हिन्दी वर्णमाला लिखने के बाद ,एक -एक अक्षर पर छड़ी ले जा कर शुरु हो जाते , ” त” . ” ख” , ” ग “….
फिर लड़कों से पहिला अक्षर दिखा के बोलें ” बोलो ,- ’त “
लड़के कहें , ” त”
माट साहब फिर कहें ” बोलो ” त” (जोर दे कर )
लड़के फिर कहें , ” त ” जोर लगा कर ।
अब माट साहब का सब्र छूटने लगा तब बिगड़ कर बोले , ” हम चाहे जौन तहें तुम तहो - ” त “
तुतलाने वाले माट साहब के चेलों को यह झेलना पड़ता है।
कहावत का निर्मान हुआ होगा कानपुर के भन्नानापुरवा में । एक सज्जन थे, मकुन्द(इस्कूल में भले मुकुन्द रहे हों ) । जिनके पास एक घोड़ी ( भई असली किस्से में तो घोड़ी ही थी , चेला नहीं।हम अपनी तरफ़ से छेड़-छाड़ नहीं करते। ) । दोनों की एक जरूरी काम की आदत समान थी। इस समानता पर कनपुरिया कहावत का जन्म हुआ ,
जस मकुन्द , तस पादन घोड़ी
अब आईं रामचेलवा पर । तब दूनो किस्सवा क्लीयर हो जाएगा । सृजन शिल्पी की धार्मिक आस्था पर चोट के सवाल पर कुल कर-कानून , नर-नियम गिना के मोहल्ला पर प्रतिबन्ध का माँग किए थे , तब भाई सृजन की पोस्ट पर का कहे थे, शिकायतकर्ता -
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on 26 Apr 2007 at 3:04 pm sanjay bengani
क्या हमारा अंतिम ध्येय मोहल्ला को हटाना ही है?
” का मेरे भाई ? शिकायतकर्ता-cum(कम)-संचालक-ज्यादा अब उद्देश्य बदल गया , राहुल का चिट्ठा हटाओ हो गया ? अपने शिकायत पे, खुदे विचार किया ? ओदा पारी हमरा संगी अनूप पूछे रहा, ‘संचालक मण्डल के लिए नाम सुझाओ’ । हम सिधाई में सुझाव दे दिए- मैथिली ,प्रियंकर ।
एक दाईं बड़ा सराफत से पूछा सिकायतकर्ता,’अफ़लातूनजी इतना आपराधिक मुकदमा?’ मेरे भाई ,ऊहो छात्र-संघ बहालिए का लड़ाई था,लोकतंत्र बहालीइए न हुआ ,ऊ लड़ाई भी ? जब आजीवन निस्कासन के पहले जो जाँच बैठा तो जाँच की कमीटी बदलावा दिए ,कानून बता के। ओही से पूछते हैं, अपना सिकायत पर खुदे विचार किए क्या?
चिट्ठा हटाने , गलती पर खेद प्रकाश ए पर भी एगो किस्सा याद आता है,जनेवि(जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का । पहिला अनिश्चितकालीन बन्दी( जनेवि छात्रसंघ के अध्यक्ष हमरे संगठन का रहे - नलिनीरंजन मोहान्ती तब) के बाद जब कुल कम्युनिस्टी( मुख्यधारा वाले, प्र.छा.स. नहीं ) माफी माँग-माँग अन्दर हो गया तब सयुस के साथी अटल बिहारी शर्मा से कुलपतिया कहा ,’लिख कर दे दो अनुशासनहीनता नहीं करूँगा,भविष्य में।निष्कासन वापस हो जाएगा ।” अटल टप्प से कहा ,”आप भी लिख कर दे दीजिए कि भविष्य में बलात्कार नहीं करेंगे ।”
भाई चिट्ठाकारी में ई सीखे कि चैटियाने , ईमेल औ फोन का उद्धरण मत दो। चिट्ठा से जेतना मन दो । लेकिन अनूप एका पालन ऐलानिया नहीं किए । हम तब्बो चैट ,फोन औ मेलामेली का उद्धरण नहीं देंगे ।
हमरे लिए हार्दिक वेदना का बात है कि धुरविरोधी भाई अपना चिट्ठा को खतम कर दिए । लोकतंत्र सेनानी रहे , धुरविरोधी भाई । हम्मे पूरा विस्वास है, पूरा तेवर के साथ लौटेंगे , जल्दिए । इस कदम पर कहता है सब - व्यक्तिगत निर्णय है । अरे तो का नारद संचालक(समूह) (सामूहिक निर्णय) ई कह सकता है का, ‘कि चिट्ठेवे खतम कर दो ?’ औ छुआछूत व्यक्तिगत आचार है कि सामाजिक बीमारी ? कई सनातनी ई मानें कि छुआछूत निजी मामला है | गाँधी काहे बीच में पड़ता है?छुआछूत ,सेन्सर,तानासाही ई सब व्यक्तिगत मामला न होता है। व्यक्ति प्रतिकार में कदम जरूर उठाते हैं।जैसे ५ जून १९७४ को,पटना की गाँधी मैदान में रेणू और नागार्जुन सरकारी सम्मान लौटा दिए,जेपी की विशाल सभा में -ईहो लैकपने वाला बात हो गया ?
छोड़ के जाए वाले अच्छा-अच्छा चिट्ठाकार सब को कौन रोकेगा ? औ ऊ साथी लोग से भी कहेंगे राहुलजी का गीत भुला गए साथी ? ” भागो मत,दुनिया को बदलो” । प्रमेन्द्र , मेरे मित्र , बताओ कौन राहुलजी ? जौने लैका का चिट्ठा हटा है , ऊहे राहुल ? बौद्धिकवा में चाहे शखवा में ई गीत न सुनोगे । ई महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का लिखा गीत है ।
ई कहेंगे ,छोड़ के जाए का मन बनाए साथी- सब से कि , कहते हो मोहल्ला के पहले साम्प्रदायिकता को ले कर चिट्ठालोक में बहस नहीं थी तो लगेगा गलतफहमी में जा रहे हो। पूछो सागर से,प्रमेन्द्र से,बेंगाणी से? मतभेद था जम के लड़ाई भी था,मनभेद नहीं था ।
साथियों व्यंग्य लिखना आसान नहीं , पद्य में पैरोडी लिखना शायद आसान है। अनूप ने राजन की एक कविता पर एक पैरोड़ी टिप्पणी में भेजी।हमें लगा कि अनूप के स्तर की नहीं तो रोक लिए। कह देगा , “नहीं, हमारा ईहे स्तर है” तो छाप देंगे ।
कहा अफलातुनवा ‘सब से तेज’ चैनल बने के चक्कर में है । परचा लिखे वाला , पोस्टर साटे वाला , क्लास लेवे वाला को चैनल मान लिए - और कोई जाने न जाने तूं तो जानते रहे । भाई ई मामला में सरकारी चैनल, जेके सब से ज्यादा लोग देखेला ,फुरसतिया स्वयंभू है ,जे सरकारी पक्ष सब के समझावे की कोसिस करेले । कुछ जिम्मेदरियो निभावे । मकुन्द को अपनी आदत के अलावा भी कुछ करना होगा।
इसलिए चिट्ठाकारों के मंच नारद से अपील करूँगा कि सामूहिकता ,सद्भावना और सहिष्णुता को प्रकट करते हुए अब भी कुछ सोचें । कुछ संचालन प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाएँ । यह शंका तो हटा ही लें कि कोई आपका स्थान तुरन्ते छीन लेगा । ई डर भी हर मेल के तानासाह को सताता है ,तब्बे ऊ हो डेरवाता है ,अन्याय करता है। अब बीस सूत्री कार्यक्रम का भी घोषणा कर दीजिए,इन्दिराजी की थी और हिटलर भी ।

इस भाखा में तो आप कुछौ लिख दिजियेगा त हीट हो जाएगा.. एमें तो खूब मौज लिए हैं.. कुछ त बुझाया औ कुछ एकदम्मे नयं बुझाया.. ऊ आपके औ फुर्सतिया के बीच का प्रायभेट चैनल पे लगता है.. जिस्का फिरकवेन्सी हमाए जानकारी में नयं है..
भाई अफ़लातूनजी,
आपके विचार पढ़ कर श्चोभ भी हुआ और मज़ा भी आया.अफ़लातून जी आप लगे रहो हम आप के साथ हैं.
अब आएगा मजा (या मौज)
अनूपजी देखिए ये आपके और अफला के बीच का कोई प्राईवेट मामला था जिसके लिए वे इस चिट्ठाकारी के मंच का ‘दुरुपयोग’ कुछ कीजिए
पढें- …दुरुपयोग कर रहे हैं कुछ कीजिए
मैं एक बात स्पष्त कर देना चाहता हूँ ताकी कोई गलत फहमी न हो. चिट्ठो को जोड़ने या हटाने में मेरी कोई भूमिका नहीं होती, मैं नारद को एक धेले का आर्थिक सहयोग नहीं करता. मुझे व्यक्तिगत रूप से गाली दी गई थी, मात्र और मात्र इसी लिए राहुल का मात्र एक ही चिट्ठा हटाया गया है. इसमें विचारधारा जैसा कोई मामला नहीं है. यह नियमानुसार हुआ है अतः आगे भी ऐसे निर्णय जरूर लिये जाएगें चाहे वह कोई भी हो.
न पेरिस में न फारस में, तौन मजा बनारस में.
आदमी कम खाए बनारस में रहे. बनारस एक मनोदशा है, उसी हमहुँ रहते हैं अक्सर.
मन खुस हुआ, कबहुँ आपके साथ छानी जाएगी विजयावटी.
साधुवाद
का दादा!
कमालै कर दिये आप . अबहियें देखा अबिनसवा जावै वाला है,हम जात हई अइसन बोल-बतरा दिया है . अब किससे रिसाएंगे-लड़ेंगे . कल अभय भाई जाने का ऐलान कर दिए . ई ठीक नहीं हो रहा है . कतई ठीक नहीं हो रहा है .
का सोचा है ? बोलिए ?
@अभय , मसिजीवी ,
जो भी है , अनूप अौर मेरे बीच ,सब कुछ साफ अौर खुला है ,चिट्ठे पर भी | आप दोनोँ को कुछ सँशय हो तो पूछ लेँ |
@सँजय ,
आप से एक सवाल अभी भी अनुत्तरित रह गया | ‘ क्या हमारा अंतिम ध्येय मोहल्ला को हटाना ही है?’ - जब धर्म पर चोट के आधार पर एक चिट्ठे को हटाने की बात उठी थी तब आप ने यह कहा | व्यक्तिगत रूप से आहत होने के बाद , ध्येय बदल गया ? प्रविष्टी हटा लिये जाने अौर भाषा की बाबत खेद प्रकट किेये जाने के बाद भी आप धार्मिक भावना पर आहत होने से ज्यादा आहत बने रहना चाहते हैँ ?
यह दो प्रश्न हैँ , जिनका नारद की नीति से मतलब नहीँ है | आप से व्यक्तिगत हैँ किन्तु चिट्ठाकारी की विधा इससे जुडी है | आप के हिन्दी चिट्ठेकारी को योगदान को स्मरण करते हुये , मैँ विश्वास अौर उम्मीद करता हूँ कि आप एक रचनात्मक भूमिका अपनायेँगे | सँवाद बना रहे | आभार |
ई सब पढ़-पढ़ा के मजा आया। तमाम पुरानी बातें याद आईं। हमारा कुछ भी गुप्त नहीं है। न इस बात से एतराज है कि बातचीत सार्वजनिक की गयी।
असल में ये एकदम सहज सी बात को इसलिये इतना तूल मिलता गया कि यह काम प्रशासनिक है और हुआ यह पारिवारिक अंदाज में। किसी को जिलाबदर कर दिया जाता है वह बात कितनों को पता चलती है? लेकिन परिवार का कोई अगर बाहर जाता है तो हल्ला मचता रहता है।
जो यह इतना हल्ला मचा वह राहुल के लिये नहीं है। राहुल तो एक मुद्दा बन गया। उस बालक को तो ब्लाग लिखना बकवास लगता है। इसके पीछे पुरानी कटुतायें हैं। पेट्रोल पहले से था सबके मन में यह तो मात्र स्पार्क था। आग लग गयी ,पेट्रोल खतम होने पर बुझ भी जायेगी।
यह ब्लाग बहाली की बात से ज्यादा मूछों की लड़ाई हो गयी। आप जिस संस्था से अपेक्षा करते हैं कि वह आपके साथ सहानुभूति रखे उसके प्रति कुछ विश्वास तो रखना ही होगा। गोदाम में न रखें शोकेस में तो रखें। :)
यहां पिछले कई दिनों से नारद को तानाशाह, सम्प्रदायवादी और न जाने क्या-क्या बताया गया। जब इस तरह की बातें होतीं है तो कभी -कभी आदमी सोचता है कि जब बदनामी हो ही गयी तो वो काम काहे न कर लें जिसके लिये बदनाम हुये।
कल एक दिन ब्लाग नहीं आये सामने हल्ला मच गया हमें निकाल दिया हमें निकाल दिया।
बात-बात पर सफ़ाई देने की जरूरत हम नहीं समझते लेकिन मैं अच्छी तरह समझता हूं ज्यादातर समस्यायें ‘कम्यूनिकेशन गैप’ के कारण हैं। चीजों के लोग अपने मन से मतलब निकाल लेते हैं।
नारद एक संकलक है। वह ब्लाग दिखाता है। राहुल के तीन ब्लाग हैं। दो की फ़ीड नारद पर है। उसमें से पिछले दिनों कुछ नहीं लिखा। तीसरे पर भी केवल तीन पोस्ट हैं जिनमें से एक में फोटो है। अगर एक ब्लाग की फ़ीड नहीं आती तो कौन सी आफ़त आ गयी। गलती की कुछ सजा मिली। उसने खेद प्रकट किया लेकिन उसे अभी बहाल नहीं किया गया क्योंकि देखा गया कि उसको टोन अपना वही रखना है। लेकिन जिस पर यह टोन है वह अभी जारी है।
किसी को इतनी फ़ुरसत नहीं है अफ़लातूनजी कि अपनी रातें और दिन खराब करके ये सारे काम करे और अपनी तरफ़ से समय लगाकर काम करे। बीबी बच्चों की कोसने सुने और यहां सुने कि अगला तानाशाह है साम्प्रदायिक है।
आपने जो वीसी वगैरह के उदाहरण दिये वे सब अप्रासंगिक हैं क्योंकि वीसी को उस काम का पैसा मिलता है, उसकी रोजी रोटी है वह। फ़ुल टाइम जाब है।
यहां ये सब काम स्वयंसेवकी में करते हैं। घर,परिवार, दफ़्तर देखते हुये। जीतू आफ़िस से नारद का काम भी देख लेते हैं। अब मान लीजिये कोई पंगा हो गया नारद पर पोस्ट आनें और अगला बास के साथ मीटिंग में गया है और उसमें दो-तीन घंटे लग गये। लौटकर आने पर अगर वह देखता है कि इस बीच तीन लोगों ने नारद को कोस-कोसकर पोस्टें पेल दीं तो अगला सोचता है भाड़ में जाये। सब कुछ।
नारद पर दिन में पचीस मेलें आती हैं हमको रजिस्टर करो हमको करो। कोई साइट भेज देता है। अब उसको जांचो देखो तब करो। यह सब बहुत समय लेता है।
मुझे याद है एक बार अविनाश ने मेरा इंटरव्यू लिया था। कुछ कम्प्यूटर में खराबी हो गयी। तीन दिन उसे पोस्ट नहीं कर पाये। यहां तीन दिन क्या तीन घंटे नारद बैठ जाता है तो हल्ला मचा देते हैं।
आप किसी बिजली घर के बाहर हल्ला मचाओ समझ में आता है कि वे अपना काम नहीं कर रहे। बहरों को जगाना जरूरी है। लेकिन निस्वार्थ भाव से लगे लोगों को अनजाने में गरियाना कहां तक उचित है?
यह दूरी ही है जो अभयतिवारी जैसे निर्मलमना व्यक्ति से यह कहलाती है अनूप शुक्ल साम्प्रदायिक हैं। इसे हम लाख तर्क दें उनके मन से निकाल नहीं सकते जबतक कि हम उनके साथ कुछ दिन गुजार न लें।
नारद उवाच की भाषा पर तमाम लोगों ने आपत्तियां कीं। हमने खेद प्रकट किया। अब आप कहो खेद-खेद बराबर हो गये उसे बहाल करो। वह अभी नहीं हो पाया।
हर एक व्यक्ति की मन:स्थिति एक सी नहीं होती न समझ। आज संजय बेंगाणी प्रमोद सिंह की जिस पोस्ट से व्यथित हुये मुझे उसमें बहुत मजा आया। जिस बात के लिये संजय बेंगाणी की पोस्ट में मसिजीवी ने आपत्ति दर्ज की मुझे उसका तुक ही नहीं समझ में आया।
संचालक की टीम में भी लोगों के अलग -अलग रुख होते हैं। ई-मेल से बतियाने में और आमने सामने बतियाने में फ़र्क होता है। आमने -सामने बात करके आप तमाम वो चीजें भी मनवा सकते हैं जो दूर होने पर आदमी साफ़ मना कर सकता है।
किसी को गाली गलौज से बहुत चिढ़ होती है किसी के दोस्त अगर गाली न दें तो लगता है कुछ नाराजगी है। उन सबको मिलाकर जब कोई ग्रुप बनता है तो वह किसी एक सा काम नहीं करता।
जहां तक तमाम लोगों के नारद को छोड़कर जाने की बात है तो आगे क्या होगा यह समय बतायेगा।लेकिन जैसा आज मसिजीवी ने बताया कि फ़ीड अगर सार्वजनिक है तो नारद को उसे लेने से रोका नहीं जा सकता। न मेरे ख्याल से रोका जाना चाहिये।
मेरा ब्लाग जब तक नारद पर आता है तब तक दो चार लोग इसकी फ़ीड से इसे लोग पढ़ चुके होते हैं। आज चिट्ठे कम हैं ,कल जब हर घंटे सौ चिट्ठे लोग पोस्ट करेंगे तब नारद अपने वर्तमान स्वरूप में अप्रासंगिक हो जायेगा।
लोगों को पता ही नहीं है कि चंदा न हमने दिया न संजय बेंगाणी ने।लोग न जाने क्या-क्या कहते हैं। अब क्या इस सब के लिये अपन नौकरी-वौकरी छोड़कर सफ़ाई देते घूमें।
मोहल्ले के आने के पहले स्वर्ग नहीं था लेकिन सहयोगी भावनायें बेहद आत्मीय थीं। निरंतर पत्रिका के पुराने अंक देखिये। जब पत्रिका निकलती थी तब अगर किसी चीज का अनुवाद करना होता था तो उसे सात-आठ भाग में बांट के एक-एक भाग करके घंटों में निपटा देते थे। यह जुड़ाव अब कम हुआ है क्योंकि हर कोई तो हमें चोर बता रहा है, तानाशाह बता रहा है।
देबाशीष,जीतेंन्द्र आदि के पास न जाने कितने लोगों के ब्लाग के पासवर्ड पड़े होंगे जिनके ब्लाग इन्होंने बना के दिये। यह किसी वर्चश्व के लिये नहीं था मालिक न किसी पर तानाशाही दिखाने के लिये।
आप पुराने अनुगूंज के लेख देख डालिये। जितने सार्थक लेख पिछले साल भर हिंदी के पांच सौ लोगों ने मिलकर नहीं लिखें होंगे शायद उससे कुछ ज्यादा वहां मिल जायें जो कि तीस-चालीस लोगों ने लिखें होंगे।
किसी के काम पर अंगुली उठाना उस पर मीन मेख करना बहुत आसान है लेकिन उससे बेहतर कर पाना कठिन होता है।
मैंन कुछ ज्यादा ही लिख दिया लेकिन क्या करें? लिख गया सो लिख गया। इसी से छांटकर प्रमोद सिंहजी अपने ब्लाग के लिये पतनशील साहित्य रचेंगे।
जिन लोगों को लग रहा है कि यह बहुत बुरा और बेहूदा माहौल बन गया है यहां उनको बता दें कि पिछले साल एक महिला अंग्रेजी ब्लागर के ब्लाग पर महीनों गाली-गलौज हुआ था। अभी यहां बहुत भाई चारा है कि हम आपको कोसते हैं तो बुरा नहीं मानते हो। इतनी लंबी पोस्ट लिखते हो। लेकिन हम अभी भी कहते हैं कि आपने लड़कपन किया था। :) अब कर लो क्या कर सकते हो।:) अच्छा लगा ये पोस्ट पढ़कर!
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