मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक

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[ '८० के दशक की शुरुआत में यह गीत जो 'वंचितों के शिक्षा-शास्त्र' के पॉलो फ़्रेरे के दर्शन से मेल खाता है , लमही गाँव में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के सम्मेलन में कृषक जी से तरन्नुम में सुना था । पूरा याद  नहीं है। भरोसा है,कोई जनवादी इसे पूरा कर देगा,यहीं । चिट्ठेकार अविनाश की पसन्द पर यहाँ दे रहा हूँ । ]

‘ क ‘ से काम कर ,

‘ ख ‘ से खा मत ,

‘ ग ‘ से गीत सुना ,

‘ घ ‘ से घर की बात न करना ,  खाली ।

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ च ‘ को सौंप चटाई ,

‘ छ ‘ ने छल छाया ,

‘ ज ‘ जंगल ने , ‘ झ ‘ का झण्डा फहराया ,

झगड़े ने बीचोबीच दबा डाली ,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ ट ‘ टूटे , ‘ ठ ‘ ठिटके ,

यूँ ‘ ड ‘ डरा गया ,

‘ ढ ‘ की ढपली हम ,

जो आया , बजा गया ।

आगे कभी न आई ‘ ण ‘ पीछे वाली,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

- रामकुमार कृषक

4 Responses to “मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक”


  1. 1 अविनाश June 11, 2007 at 3:41 pm

    क्‍या बात है। अद्भुत कविता। हिंदी कविता का मैदान इन दिनों ऐसी कविताओं से कितना खाली है! उफ्फ!

  2. 2 संजय बेंगाणी June 11, 2007 at 5:04 pm

    त से आगे भी बढ़ाएं.

  3. 3 मैथिली June 11, 2007 at 7:49 pm

    मेहनतकशों का ककहरा अपूर्ण ही तो है अबतक, शायद इसके प्रतीक में ही ये ककहरा पूरा नहीं हुआ.
    एक दिन सुबह जरूर आयेगी और मेहतनतकशों का ककहरा पूरा होगा.
    ये कविता वाकई अद्भुत है.

  4. 4 PRAMENDRA PRATAP SIN June 11, 2007 at 8:08 pm

    अद्भुत


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