Entries from June 2007

June 30, 2007

पचखा-मुक्त एग्रीगेटरों से जुड़ें ,ट्राफ़िक बढ़ायें

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    हिन्दी चिट्ठों तक ज्यादातर पाठक एग्रीगेटरों के जरिए पहुँचते हैं । जितने ज्यादा एग्रीगेटरों में आपके चिट्ठे की प्रविष्टियों की सूचना होगी उतने ज्यादा आगन्तुकों की उम्मीद रखिए ।
    कुछ पाठक खोजी इंजनों के सहारे भी आपके चिट्ठे तक पहुँचते हैं । आप अपनी प्रविष्टी के लिए किन शब्दों का [...]

June 28, 2007

जिद्दू कृष्णमूर्ति की जबानी

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    मन हमेशा ताजा , युवा , अबोध ,ओजस्विता और उमंग से सरोबार हों ।इसके लिए काफ़ी चेतना की जरूरत होगी । तुम्हारे मन में क्या हो रहा है ,यह चेतना । इसी स्थिति में हम कुछ सीखते हैं ।मन में चल रहे भावों को सही और गलत के खाँचों में बाँटने की जरूरत [...]

June 27, 2007

नाम : स्फुट विचार

    महाराष्ट्र में कुछ पति अपनी पत्नी का नाम बदल कर मनपसन्द नाम रख लेते हैं , शादी के बाद, झटके में ।
    मीरा जब प्रोफेसर इन्दिरा के यहाँ झाड़ू-पोछा-बरतन-कपड़ा करने पहले-पहल गयी तब उसे बता दिया गया कि उसका नाम मालती रहेगा । प्रो. इन्दिरा के घर में मीरा के पहले काम करने मालती [...]

June 18, 2007

प्रिय अनूप , ‘अप्रिय निर्णय’ और असहाय सच

 
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प्रिय चिट्ठेकार अभय त्रिपाठी ने ‘खूबसूरत’-से निर्मल-आनन्द अन्दाज में टोका था, “फिल्मी गीतों का बुझौव्वल ‘शैशव’ पर क्यो देते हो ? ” मुझे लगा उनका बिल्लू जिन दृश्यों के लावण्य से किंकर्तव्य्विमूढ़ हो सकता है तो जरूर फिल्मी गाने भी सुनता होगा ,कभी कदाच हॉल ( गुजरातियों या मालवा के लोग जिसे  ‘होल’ कहेंगे । ) में [...]

June 15, 2007

‘चार कौए उर्फ़ चार हौए’ : [ चिट्ठालोक के बहाने ]

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[ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने आपात काल के खिलाफ़ कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प लिया था । प्रति दिन तीन कविताओं द्वारा तानाशाही का विरोध प्रकट करते थे । फिर यह पुस्तक के रूप में 'त्रिकाल सन्ध्या' नाम से छपी । आपात काल के दौरान सेन्सरशिप की अवहेलना करने वाली पत्रिका बुनियादी यकीन [...]

June 11, 2007

मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक

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[ '८० के दशक की शुरुआत में यह गीत जो 'वंचितों के शिक्षा-शास्त्र' के पॉलो फ़्रेरे के दर्शन से मेल खाता है , लमही गाँव में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के सम्मेलन में कृषक जी से तरन्नुम में सुना था । पूरा याद  नहीं है। भरोसा है,कोई जनवादी इसे पूरा कर देगा,यहीं । चिट्ठेकार अविनाश की [...]

June 5, 2007

गूगल ने कर दिया मण्ठा

बुझौव्वल की सोर में मण्ठा डाल दिया गूगल ने । शहरी पाठकों को बताना पड़ेगा कि सोर कहते हैं जड़ को और यह किंवदन्ती है कि पौधे की जड़ में मठ्ठा या मण्ठा डाल देने पर वह जल जाता है,उसका नाश हो जाता है। भाग लेने वाले तीन मित्रों ने खुद बताया कि गूगल से उन्हें जवाब देने [...]