Archive for June, 2007

पचखा-मुक्त एग्रीगेटरों से जुड़ें ,ट्राफ़िक बढ़ायें

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    हिन्दी चिट्ठों तक ज्यादातर पाठक एग्रीगेटरों के जरिए पहुँचते हैं । जितने ज्यादा एग्रीगेटरों में आपके चिट्ठे की प्रविष्टियों की सूचना होगी उतने ज्यादा आगन्तुकों की उम्मीद रखिए ।

    कुछ पाठक खोजी इंजनों के सहारे भी आपके चिट्ठे तक पहुँचते हैं । आप अपनी प्रविष्टी के लिए किन शब्दों का पुछल्ला (tags) लगा रहे हैं ? पुछल्लों के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है कि - उनको लोग खोजी इंजनों में डालते होंगे अथवा नहीं ।

    ई-मेल - समूहों (Groups) के जरिए भी कुछ पाठक आप तक पहुँच सकते हैं - समूह के उद्देश्य और आपकी चिट्ठे की सामग्री का नाता बनता हो , तब !

    आप निजी फ़ीड रीडरों द्वारा भी पसन्दीदा चिट्ठों की नई प्रविष्टियों की सूचना पा सकते हैं। वर्डप्रेस के चिट्ठाधारक तो Blog Surfer के जरिए अपने पसन्दीदा चिट्ठों के फ़ीड भी पढ़ सकते हैं । गूगल या ब्लॉगर ( अब एक ही कम्पनी ) के पंजीकृत चिट्ठेकार अन्य चिट्ठों की अद्यतन प्रविष्टियों की सूचना उतनी आसानी से रख सकते हैं जितनी सरलता से वे अपने ई-मेल पढ़ते हैं - गूगल रीडर के द्वारा । गूगल रीडर के बारे में कदम-दर-कदम जानकारी यहाँ मौजूद है । किसी भी चिट्ठे की अद्यतन प्रविष्टियों की जानकारी पाने के लिए आप को  उसकी ‘फ़ीड’ (शायद इस शब्द में आप उस चिट्ठे की लीद की ध्वनि या गन्ध पाएँ तो बहुत ग़लत नहीं होगा) का ग्राहक(मुफ़्त) बनना होगा ।

  अतिशीघ्र आपको प्रतीक पाण्डे के हिन्दीब्लॉग्स , आलोकजी के चिट्ठाजगत के बारे में जानकारी दी जाएगी ।इन कड़ियों पर आपने अपने चिट्ठे पंजीकृत न कराए हों तो अब से करवा लें। कथित ‘सामूहिक प्रयासों’ की तुलना में यह व्यक्तिगत प्रयास उदार और विवेकशील लगेंगे। 

    ‘पचखा’ में चल रहे नारद से मुक्ति के लिए एक शानदार औजार आ रहा है जुलाई १० के पहले । धुरविरोधी द्वारा कड़े प्रतिकार का रचनात्मक पहलू और अक्स हम उसी एग्रीगेटर में देखेंगे । आज मैथिलीशरण गुप्त के ‘जयद्रथ-वध’ की पंक्तियाँ याद आ रही हैं :

दुर्वृत्त दुर्योधन न जो शठता सहित हठ ठानता,

जो प्रेमपूर्वक पाण्डवों की मान्यता को मानता ।

तो डूबता भारत न यों रण-रक्त पारावार में ,

ले डूबता है एक पापी नाँव को मझदार में । ।

जिद्दू कृष्णमूर्ति की जबानी

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    मन हमेशा ताजा , युवा , अबोध ,ओजस्विता और उमंग से सरोबार हों ।इसके लिए काफ़ी चेतना की जरूरत होगी । तुम्हारे मन में क्या हो रहा है ,यह चेतना । इसी स्थिति में हम कुछ सीखते हैं ।मन में चल रहे भावों को सही और गलत के खाँचों में बाँटने की जरूरत नहीं , क्योंकि ऐसा करने पर हम एक सेन्सर लगा रहे होते हैं । एक यात्रा  , जिसमें धारणाओं , निष्कर्षों ,पूर्वाग्रहों के बोझ के बिना निकलना जरूरी है ।

    अगर तुम्हें लगता है कि खुद के बारे में जानना जरूरी है क्योंकि मैं या और कोई ऐसा कह रहा है तब संवाद ख़त्म हो जाता है । यदि इस बात पर हम सहमत हो जाँए कि अन्तर्मन की यात्रा बहुत महत्वपूर्ण है ,तब हमारा एक अलग नाता होगा - साथ - साथ हम एक  आनन्दमय , सतर्क और समझदार खोज में लगेंगे ।

    मैं तुम्हारा विश्वास नहीं माँग रहा क्योंकि ऐसा करने पर मैं खुद को ऊँचे आसन पर बैठा लूँगा । अपना गुरु और शिष्य तुम्हें खुद होना होगा । मूल्यवान और जरूरी मान कर हम जिन बातों को स्वीकार करते हैं उन सब पर सवाल करने होंगे ।

    किसी का अनुसरण न करने में अकेला-सा महसूस होगा । तब हो जाओ अकेले ।जैसे तुम हो उससे मुखातिब होने पर पता चलेगा कि तुम खाली , मलिन , बोका , कुरूप ,दोषी और व्याकुल हो - एक क्षुद्र , रद्दी ,सेकेण्ड हैन्ड हस्ती हो ।इस हकीकत से मुँह न मोड़ो। मुँह मोड़ते ही भय का आरम्भ होगा ।

    खुद की पड़ताल में हम बाकी दुनिया से खुद को अलग-थलग नहीं कर रहे हैं । यह अस्वस्थ प्रक्रिया नहीं है । दुनिया भर में इन्सान रोजमर्रा की इन्हीं मुश्किलात को झेलता है , जिन्हें हम खुद झेल रहे हैं । इस पड़ताल में कत्तई विक्षिप्तता नहीं है चूँकि व्यक्ति और समूह में फर्क नहीं है । मैं जैसा हूँ , उस हिसाब से मैंने एक दुनिया बनाई है । हम  हिस्से और समग्र की लड़ाई में न खो जाँए ।

नाम : स्फुट विचार

    महाराष्ट्र में कुछ पति अपनी पत्नी का नाम बदल कर मनपसन्द नाम रख लेते हैं , शादी के बाद, झटके में ।

    मीरा जब प्रोफेसर इन्दिरा के यहाँ झाड़ू-पोछा-बरतन-कपड़ा करने पहले-पहल गयी तब उसे बता दिया गया कि उसका नाम मालती रहेगा । प्रो. इन्दिरा के घर में मीरा के पहले काम करने मालती आती थी ।

    मन्जू भी मीरा की तरह काशी विश्विद्यालय परिसर में अध्यापकों के घरों में काम करती है । उसका नाम इसलिए बदला गया क्योंकि मालकिन की किसी रिश्तेदार का नाम भी मन्जू था ।

    फ्रिजीडेर कम्पनी के रेफ़्रिजरटर का छोटा नाम ‘फ्रिज’ ऐसा चला कि कम्पनी का उत्पाद जहाँ उपलब्ध नहीं है , वहाँ भी रेफ़्रिजरेटर को फ्रिज ही कहा जाता है । भारत में वनस्पति के लिए डालडा और कपड़ा धोने के पाउडर के लिए सर्फ या निरमा चलता है । ओडिसा में मैंने स्टेट्समैन दैनिक मँगवाने के लिए ” इंग्रेजी ‘समाज’ ” माँगते हुए लोगों को सुना है । ‘समाज’ ओडिया का सब से अधिक बिकने वाला दैनिक है ।

    व्यक्ति या वस्तु का नाम बदल देना ,उसकी हैसियत पर निर्भर है । हैसियत मजबूत हुई तो अन्य वस्तुओं के साथ उसका नाम जुड़ जाता है । मार्टिन लूथर किंग ,सीज़र शावेज ,लान्ज़ा देल वास्ता , लेच वॉलेसा , नेलसन मण्डेला के साथ ‘गाँधी’ जुड़ गया ।

    उत्तर भारत में ईसाई पादरियों द्वारा कार्यक्षेत्र में नाम बदल लेने का चलन व्यापक है । उनके नाम एलेक्स , मैथ्यू , जैसे नामों से बदल कर फ़ादर स्नेहानन्द , फ़ादर आनन्द , फ़ादर विनोद , फ़ादर अनिलदेव , अखिलेश भाई , दिलराज और नीति भाई जैसे नाम रखे जाते हैं ।

 स्त्री - पुरुषों के नाम में सिख अभेद करते हैं । हांलाकि ‘सिंह’ या ‘कौर’ द्वारा भेद प्रकट हो जाता है।

    भारत में नाम का उत्तरार्ध आम तौर पर जातिसूचक होता है । बिहार आन्दोलन के दौरान कई स्थानों पर कुन्तलों में खुद-से तोड़ी हुई  जनेऊ का ढेर लग जाता था । इसके अलावा नाम का उत्तरार्ध हटाने का चलन भी व्यापक हो गया था । कुछ ने बागी ,संग्रामी ,आज़ाद ,इंकलाब,राही , क्रान्ति जैसे पद अपने नामों से जोड़ लिए । महाराष्ट्र में इसी ढंग की चेतना से नाम के साथ माँ और बाप का नाम जोड़ने का रिवाज चला ।

    विवाह के बाद पति का जाति नाम धारण करने की प्रचलित परम्परा को तोड़ने के प्रयोग भी हुए हैं । पति का जाति-सूचक नाम न जोड़ने , विवाह-पूर्व का जाति-नाम बरकरार रखने और दोनों जोड़ कर रखने के उदाहरण मिल जाएँगे । 

    स्कूल की बाहर रहने वाले बच्चों को पढ़ाते वक्त मैंने पाया कि कई बच्चे अपनी दादी ,नानी , बूआ , चाची ,मामी ,मौसी , और माँ तक का नाम नहीं जानते । औरत की सामाजिक-पारिवारिक हैसियत का द्योतक है , यह ।

   

प्रिय अनूप , ‘अप्रिय निर्णय’ और असहाय सच

 

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प्रिय चिट्ठेकार अभय त्रिपाठी ने ‘खूबसूरत’-से निर्मल-आनन्द अन्दाज में टोका था, “फिल्मी गीतों का बुझौव्वल ‘शैशव’ पर क्यो देते हो ? ” मुझे लगा उनका बिल्लू जिन दृश्यों के लावण्य से किंकर्तव्य्विमूढ़ हो सकता है तो जरूर फिल्मी गाने भी सुनता होगा ,कभी कदाच हॉल ( गुजरातियों या मालवा के लोग जिसे  ‘होल’ कहेंगे । ) में अद्धा टिकट पर आधी फिलम भी देख ली होगी , तो अचरज नहीं । लेकिन अभयजी ने हमें जिस भावना से टोका था उसको बहुत जल्दी नजरअन्दाज कर रहा हूँ ! दुनिया के बच्चे माफ़ करें ।

काहे , भाई ?  इसलिए ‘शैशव’ चुना है कि हमारे ‘अप्रिय’ निर्णय वाले प्रिय दोस्त अनूप ने हमे बचकाना कह दिया । सही कहा कि नाराज नहीं होंगे।हम ने कहा कि ऊ औ देबासीस जयपरकास नीयर हैं लेकिन उसको बाबा विनोबे का रोल पसन्द है । बाबो कहते थे , ‘गाँधी ने आजादी की एक व्याख्या की थी - आजादी मतलब ग़लतियाँ करने का हक’ । तब बाबा को  करे दो गलती ! त भाई , गलतिया खाली आपै करेंगे ? कोई गलती करेगा तो सुधरेगा भी नहीं ?

ई अप्रिय निर्णय वाला हमारा प्रिय अनूप का ए गो किस्सा सुनिए,बचपन का नहीं ,’छोटी जवानी’ का( १९८५ का होगा) :

प्रौद्योगिकी संस्थान , काशी विश्वविद्यालय के एम टेक. के छात्र अनूप और सांख्यिकी के शोध छात्र हम । छात्रसंघ चुनाव में समता युवजन सभा का उम्मीदवार मैं और प्रौद्योगिकी संस्थान में हम्मे लड़ावे वाला मुख्य साथी लोगन में एक अनूप । आदर्शवादी तरुण ।

सयुस का चुनाव लड़े का ढ़ंग अलग , लड़ावे वाले अलग ढंग के , नारा भी अलगै होता था । दूसरा सब का मोटर साइकिल जुलूस निकले तो हमिनी का साइकिल जुलूस । तब देखा-देखी और लोग भी साइकिल जुलूस का कोसिस किए।बड़ा-बड़ा लाद वाले मनोज सिन्हा ( बाद में सांसद गाजीपुर ) , वीरेन्द्र सिंह जिनको चंचल कुमार वीरेन्द्र सिंह ‘पोतेदार’ कहता था ( इन्दिराजी वाले पोतेदार की नकल में नहीं,’जस नाम तस गुन’ के नाते) आदि । तबका हमहने क साथी ओमपरकसवा ( अभी प्रोफ़ेसर पत्रकारिता , काशी विद्यापीठ) नारा बनाया , ‘सयुस की साइकिल देखी , सबने मोटरसाइकिल फेंकी ‘ । चिढ़ जाँए सब,’सरवा एक तो साइकिल पे चढ़वाया , अब सब मजा ले रहा है ।

पोस्टरवा भी हाथे का बना रहता था । छपलका नहीं । कौनो साथी रमन हॉस्टल(इंजीनियरिंग वाले लैकों के दस में से एक हॉस्टल) के नोटिस बोर्डे पर हमारा पोस्टर साट दिया ।गलत जगह साटा।पोस्टरवा से नोटिस तोपा जाएगी। हॉस्टल में प्रतिक्रिया शुरु हो गई । मैं पहुँचा तो मुझे बुलाकर बन्द कमरे में समझाया गया कि आप खुद अपने हाथ से उसे उखाड़िएगा , दिनवे में । तो भैय्या अपने पोस्टर अपने हाथ से उखड़वाये अनूप और साथी , आपत्तिजनको नहीं था । पोस्टरवा निकाले , माहौल बन गया । इन्जीनियरिंग कॉलेज , दृश्य कला संकाय , महिला महाविद्यालय और चिकित्सा विज्ञान संस्थान में तो एक साल पहिले ही नं १ पर रहे - फिर चँप गया माहौल।

मेरे भाई अनूप ,पोस्टरवा (चिट्ठा की प्रविष्टी) फिर हट चुका ,अबकि आपत्तिजनक था तो माफ़ी भी माँग लिया, लेखक ।अब फिर माहौल काहे नहीं बना पाए ?

शिकायतकर्ता का हाल सुनने के पहले एक कनपुरिया किस्सा और एक कनपुरिया कहावत ।

कानपुर के झकरकटी मोहल्ले में गधैय्या गोल में एक माट साहब थे । हिन्दी वर्णमाला लिखने के बाद ,एक -एक अक्षर पर छड़ी ले जा कर शुरु हो जाते , ” त” . ” ख” , ” ग “….

फिर लड़कों से पहिला अक्षर दिखा के बोलें ” बोलो ,- ’त “

लड़के कहें , ” त”

माट साहब फिर कहें ” बोलो ” त” (जोर दे कर )

लड़के फिर कहें , ” त ” जोर लगा कर ।

अब माट साहब का सब्र छूटने लगा तब बिगड़ कर बोले , ” हम चाहे जौन तहें तुम तहो - ” त “

तुतलाने वाले माट साहब के चेलों को यह झेलना पड़ता है।

कहावत का निर्मान हुआ होगा कानपुर के भन्नानापुरवा में । एक सज्जन थे, मकुन्द(इस्कूल में भले मुकुन्द रहे हों ) । जिनके पास एक घोड़ी ( भई असली किस्से में तो घोड़ी ही थी , चेला नहीं।हम अपनी तरफ़ से छेड़-छाड़ नहीं करते। ) । दोनों की एक जरूरी काम की आदत समान थी। इस समानता पर कनपुरिया कहावत का जन्म हुआ ,

जस मकुन्द , तस पादन घोड़ी

 अब आईं रामचेलवा पर । तब दूनो किस्सवा क्लीयर हो जाएगा । सृजन शिल्पी की धार्मिक आस्था पर चोट के सवाल पर कुल कर-कानून , नर-नियम गिना के मोहल्ला पर प्रतिबन्ध का माँग किए थे , तब भाई सृजन की पोस्ट पर का कहे थे, शिकायतकर्ता

  • on 26 Apr 2007 at 3:04 pm sanjay bengani

    क्या हमारा अंतिम ध्येय मोहल्ला को हटाना ही है?

 ”  का मेरे भाई ? शिकायतकर्ता-cum(कम)-संचालक-ज्यादा अब उद्देश्य बदल गया , राहुल का चिट्ठा हटाओ हो गया ? अपने शिकायत पे, खुदे विचार किया ? ओदा पारी हमरा संगी  अनूप पूछे रहा, ‘संचालक मण्डल के लिए नाम सुझाओ’ । हम सिधाई में सुझाव दे दिए- मैथिली ,प्रियंकर । 

एक दाईं बड़ा सराफत से पूछा सिकायतकर्ता,’अफ़लातूनजी इतना आपराधिक मुकदमा?’ मेरे भाई ,ऊहो छात्र-संघ बहालिए का लड़ाई था,लोकतंत्र बहालीइए न हुआ ,ऊ लड़ाई भी ? जब आजीवन निस्कासन के पहले जो जाँच बैठा तो जाँच की कमीटी बदलावा दिए ,कानून बता के। ओही से पूछते हैं, अपना सिकायत पर खुदे विचार किए क्या?

चिट्ठा हटाने , गलती पर खेद प्रकाश ए पर भी एगो किस्सा याद आता है,जनेवि(जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय) का । पहिला अनिश्चितकालीन बन्दी( जनेवि छात्रसंघ के अध्यक्ष  हमरे संगठन का  रहे - नलिनीरंजन मोहान्ती तब)  के बाद जब कुल कम्युनिस्टी( मुख्यधारा वाले, प्र.छा.स. नहीं ) माफी माँग-माँग अन्दर हो गया तब सयुस के साथी अटल बिहारी शर्मा से  कुलपतिया कहा ,’लिख कर दे दो अनुशासनहीनता नहीं करूँगा,भविष्य में।निष्कासन वापस हो जाएगा ।” अटल टप्प से कहा ,”आप भी लिख कर दे दीजिए कि भविष्य में बलात्कार नहीं करेंगे ।”

भाई चिट्ठाकारी में ई सीखे कि चैटियाने , ईमेल औ फोन का उद्धरण मत दो। चिट्ठा से जेतना मन दो । लेकिन अनूप एका पालन ऐलानिया नहीं किए । हम तब्बो चैट ,फोन औ मेलामेली का उद्धरण नहीं देंगे ।

 हमरे लिए हार्दिक वेदना का बात है कि धुरविरोधी भाई अपना चिट्ठा को खतम कर दिए । लोकतंत्र सेनानी रहे , धुरविरोधी भाई । हम्मे पूरा विस्वास है, पूरा तेवर के साथ लौटेंगे , जल्दिए ।  इस कदम पर कहता है सब - व्यक्तिगत निर्णय है । अरे तो का नारद संचालक(समूह) (सामूहिक निर्णय) ई कह सकता है का, ‘कि चिट्ठेवे खतम कर दो ?’ औ छुआछूत व्यक्तिगत आचार है कि सामाजिक बीमारी ? कई सनातनी ई मानें कि छुआछूत निजी मामला है | गाँधी काहे बीच में पड़ता है?छुआछूत ,सेन्सर,तानासाही ई सब व्यक्तिगत मामला न होता है। व्यक्ति प्रतिकार में कदम जरूर उठाते हैं।जैसे ५ जून १९७४ को,पटना की गाँधी मैदान में रेणू और नागार्जुन सरकारी सम्मान लौटा दिए,जेपी की विशाल सभा में -ईहो लैकपने वाला बात हो गया ?

छोड़ के जाए वाले अच्छा-अच्छा चिट्ठाकार सब को कौन रोकेगा ? औ ऊ साथी लोग से भी कहेंगे राहुलजी का गीत भुला गए साथी ? ” भागो मत,दुनिया को बदलो” । प्रमेन्द्र , मेरे मित्र , बताओ कौन राहुलजी ? जौने लैका का चिट्ठा हटा है , ऊहे राहुल ? बौद्धिकवा में चाहे शखवा में  ई गीत न सुनोगे । ई महापण्डित राहुल सांकृत्यायन का लिखा गीत है ।

ई कहेंगे ,छोड़ के जाए का मन बनाए साथी- सब से कि , कहते हो मोहल्ला के पहले साम्प्रदायिकता को ले कर चिट्ठालोक में बहस नहीं थी तो लगेगा गलतफहमी में जा रहे हो। पूछो सागर से,प्रमेन्द्र से,बेंगाणी से? मतभेद था जम के लड़ाई भी था,मनभेद नहीं था ।

साथियों व्यंग्य लिखना आसान नहीं , पद्य में पैरोडी लिखना शायद आसान है। अनूप ने राजन की एक कविता पर एक पैरोड़ी टिप्पणी में भेजी।हमें लगा कि अनूप के स्तर की नहीं तो रोक लिए। कह देगा , “नहीं, हमारा ईहे स्तर है” तो छाप देंगे ।

कहा अफलातुनवा ‘सब से तेज’ चैनल बने के चक्कर में है । परचा लिखे वाला , पोस्टर साटे वाला , क्लास लेवे वाला को चैनल मान लिए - और कोई जाने न जाने तूं तो जानते रहे । भाई ई मामला में सरकारी चैनल, जेके सब से ज्यादा लोग देखेला ,फुरसतिया स्वयंभू है ,जे सरकारी पक्ष सब के समझावे की कोसिस करेले । कुछ जिम्मेदरियो निभावे । मकुन्द को अपनी आदत के अलावा भी कुछ करना होगा।

इसलिए चिट्ठाकारों के मंच नारद से अपील करूँगा कि सामूहिकता ,सद्भावना और सहिष्णुता को प्रकट करते हुए अब भी कुछ सोचें । कुछ संचालन प्रक्रिया को लोकतांत्रिक बनाएँ । यह शंका तो हटा ही लें कि कोई आपका स्थान तुरन्ते छीन लेगा । ई डर भी हर मेल के तानासाह को सताता है ,तब्बे  ऊ हो डेरवाता है ,अन्याय करता है। अब बीस सूत्री कार्यक्रम का भी घोषणा कर दीजिए,इन्दिराजी की थी और हिटलर भी ।

‘चार कौए उर्फ़ चार हौए’ : [ चिट्ठालोक के बहाने ]

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[ कवि भवानीप्रसाद मिश्र ने आपात काल के खिलाफ़ कविताओं की त्रिकाल सन्ध्या का संकल्प लिया था । प्रति दिन तीन कविताओं द्वारा तानाशाही का विरोध प्रकट करते थे । फिर यह पुस्तक के रूप में 'त्रिकाल सन्ध्या' नाम से छपी । आपात काल के दौरान सेन्सरशिप की अवहेलना करने वाली पत्रिका बुनियादी यकीन तथा भूमिपुत्र (गुजराती ) में यह कविताएँ छपा करती थीं, रणभेरी जैसी साइक्लोस्टाइल्ड भूमिगत बुलेटिनों के अलावा । पत्रिकाओं को  छापने वाले प्रेस को तालाबन्दी जैसी कार्रवाई झेलनी पड़ती थी । दोनों पत्रिकाएँ तब गुजरात से छपती थीं जहाँ स्व. बाबूभाई पटेल की गैर काँग्रेसी सरकार आपात काल के शुरुआती दिनों में रही ।

चिट्ठालोक के मौजूदा माहौल को देखते हुए मुझे त्रिकाल सन्ध्या से यह बाल-कविता देना उचित लगा । ]

चार कौए उर्फ चार हौए

बहुत नहीं सिर्फ चार कौए थे काले ,

उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले ,

उनके ढंग से उड़ें , रुकें , खायें और गायें,

वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनायें

 

कभी - कभी जादू हो जाता है दुनिया में

दुनिया - भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में

ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गए

इनके नौकर चील , गरुड़ और बाज हो गए

 

हंस , मोर , चातक , गौरैयें किस गिनती में

हाथ बाँधकर खड़े हो गए सब विनती में

हुक्म हुआ , चातक पंछी रट नहीं लगाए

पिऊ - पिऊ को छोड़ें कौए - कौए गायें

 

बीस तरह की काम दे दिए गौरैयों को

खान - पीना मौज उड़ाना छुट भैयों को

कौओं की ऐसी बन आई पाँचों घी में

बड़े बड़े मनसूबे आए उनके जी में

उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले

उड़ने वाले सिर्फ रह गए बैठे ठाले

 

आगे क्या कुछ हुआ सुनाना बहुत कठिन है

यह दिन कवि का नहीं चार कौवों का दिन है

उत्सुकता जग जाए तो मेरे घर आ जाना

लंबा किस्सा थोड़े में किस तरह सुनाना

- भवानीप्रसाद मिश्र .

[ विद्याचरण शुक्ल , बन्सीलाल , सन्जय गाँधी तथा एक अन्य काँग्रेसी(कौन?कोई बताए) -'चार कौए' तथा 'बीस तरह के काम' से मतलब इन्दिरा गाँधी का बीस सूत्री कार्यक्रम । इसी बीस सूत्री कार्यक्रम का संघ के सरसंघचालक द्वारा समर्थन करने के बाद के बाद संघ के कार्यकर्ता छूटने लगे थे ।]

मेहनतकशों का अपूर्ण ककहरा : रामकुमार कृषक

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[ '८० के दशक की शुरुआत में यह गीत जो 'वंचितों के शिक्षा-शास्त्र' के पॉलो फ़्रेरे के दर्शन से मेल खाता है , लमही गाँव में राष्ट्रीय जनवादी सांस्कृतिक मोर्चे के सम्मेलन में कृषक जी से तरन्नुम में सुना था । पूरा याद  नहीं है। भरोसा है,कोई जनवादी इसे पूरा कर देगा,यहीं । चिट्ठेकार अविनाश की पसन्द पर यहाँ दे रहा हूँ । ]

‘ क ‘ से काम कर ,

‘ ख ‘ से खा मत ,

‘ ग ‘ से गीत सुना ,

‘ घ ‘ से घर की बात न करना ,  खाली ।

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ च ‘ को सौंप चटाई ,

‘ छ ‘ ने छल छाया ,

‘ ज ‘ जंगल ने , ‘ झ ‘ का झण्डा फहराया ,

झगड़े ने बीचोबीच दबा डाली ,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

‘ ट ‘ टूटे , ‘ ठ ‘ ठिटके ,

यूँ ‘ ड ‘ डरा गया ,

‘ ढ ‘ की ढपली हम ,

जो आया , बजा गया ।

आगे कभी न आई ‘ ण ‘ पीछे वाली,

सोचो हम तक कैसे पहुँचे खुशहाली !

- रामकुमार कृषक

गूगल ने कर दिया मण्ठा

बुझौव्वल की सोर में मण्ठा डाल दिया गूगल ने । शहरी पाठकों को बताना पड़ेगा कि सोर कहते हैं जड़ को और यह किंवदन्ती है कि पौधे की जड़ में मठ्ठा या मण्ठा डाल देने पर वह जल जाता है,उसका नाश हो जाता है। भाग लेने वाले तीन मित्रों ने खुद बताया कि गूगल से उन्हें जवाब देने में मदद मिली । जिन्होंने ने सहारा नहीं लिया या सहारा लेने की सोच ही न पाए उन्हें यह लगना लाजमी है कि उनके साथ नाइंसाफी हुई । दरअसल प्रश्नकर्ता को अपना कौशल इसमें दिखाना था कि उसके सवाल मशीन से उगलवाना सहज न हो।जिन्होंने गूगल से मदद ली उन्होंने अनुचित नहीं किया ।

    १११ लोगों ने बुजौव्वल को देखा , ८ ने जवाब दिए , कुछ ने सवाल कठिन होने की शिकायत की । परिणाम :

    प्रथम स्थान : जीतू उर्फ़ जीतेन्द्र चौधरी , धुरविरोधी उर्फ … , v9y उर्फ विनय जैन तथा अभिषेक ओझा

    द्वितीय स्थान : सागर चन्द नाहर

    तृतीय स्थान : नितिन बागला तथा प्रमेन्द्र कुमार सिंह

    चतुर्थ स्थान : अन्नपूर्णा

   कुछ भागीदार वरिष्ठ साथियों ने चेताया है कि पुरस्कार भेजो वर्ना भाग नहीं लेंगे ! विविध - भारती को काएदे से पुरस्कार प्रायोजित करने चाहिए स्वर्ण जयन्ती वर्ष के मद्दे नज़र ।

    सभी प्रतिभागियों के उत्तर अतिशीघ्र मूल प्रवि्ष्टी की टिप्पणियों में देखे जा सकेंगे,यहाँ


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