मेरी बगिया ( २ )

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    अनामदासजी , भाग्यवान जरूर हूँ कि महमना मालवीय द्वारा स्थापित इस परिसर में रहता हूँ। जिन चित्रों को यहाँ पेश कर रहा हूँ वे हमारे आवास की बगिया के हैं । मेरी पत्नी डॉ. स्वाति काशी विश्वविद्यालय में भौतिकी की व्याख्याता हैं।अधिकांश फलदार वृक्ष - लंगडा , अमरूद , चार तरह के नीबू , कटहल ,  ताड़ प्रोफ़ेसर कैलाशचन्द्र बसुचौधरीजी के लगाये हुए हैं। वे इसी आवास में कई वर्ष रहे और अवकाश-प्राप्ति के बाद आगरा में हैं ।प्रो. बसुचौधरी मेरे साढू भी हैं। इस आवास को हम पसन्द करते थे और पत्नी को वरिष्टता के आधार पर , कुछ साल पहले यह आवण्टित भी हो गया । अब अवकाशप्राप्ति तक यह आवास नहीं छोड़ना है ।

    बचपन में भाई – बहन (बड़े) का एक बॉक्स कैमेरा था – कोडाक ब्राउनी , दरजा आठ में पहुँचे तब हमारे हाथ आया । स्कूल में फिल्म की धुलाई पर भी हाथ आजमाने का अवसर मिला । बहरहाल वह बक्से वाला कैमेरा शायद किसी भतीजे को दे दिया गया था । साल – डेढ़ साल पहले एक छोटी बहन और एक भाभी ने यह कैमेरा भेंट दिया जिससे से फिर तसवीरें खींच रहा हूँ । मेरे साथी चंचल मुखर्जी का कहना था कि कैमेरा एक काम का औजार है, पुलिस दमन आदि की फोटू बतौर प्रमाण खींच कर रखी जा सकती है ।

    प्रत्यक्षा , पक्षियों के चित्र खींचना सरल नहीं है । काफ़ी धीरज चाहिए। उनमें कुछ ज्यादा शर्मीले पक्षियों की तसवीर खींचने में धीरज ,फुरसत , तकनीक और तालीम की जरूरत शायद और अधिक हो ? इस कठफोडवे को देख पा रही हैं ?

अपनी लाल कलगी के कारण शायद ध्यान खीच ले । मैंने पाया है कि अक्सर लोग हुदहुद को कठफोड़वा समझ बैठते हैं । बड़ी तसवीर को छाँट कर दिखा पा रहा हूँ। कुछ दिन पहले कुछ चिट्ठाकार कौए न दिखने से परेशान थे । मुझे बचपन में देखे हुए कौओं के सम्मेलनों की स्पष्ट याद है,लेकिन फिलहाल इन महाशय को खींचने के लिए मुझे एक बड़े सेमर के पेड़ सहित खींचना पड़ा - 

    आज कल एक लाल चक्षु कोयल(सभी कोयलों की आँखें लाल ही होती होंगी) कटहल और चम्पा पर आती है । कोयल की तसवीर लेना एक चुनौती है। लेकिन इनको मैं सफेद पेट वाली रॉबिन जानता हूँ -

और इस सुन्दर फूल का नाम कोई बताए,मैं नहीं जानता -

  यह गन्धराज नामक नीबू है । कुछ लम्बोतरे,मोटी खाल और विशिष्ट सुगन्ध वाले।

  इस नीबू की खाल पतली है और फल के कुल वजन में रस का अनुपात ज्यादा ।

    आप सब इस छोटी से बगिया को देखने आ सकते हैं- खैरम कदम । लिली के बल्ब ,कटहल,आम,नीबू – रहा तो मिल भी सकता है ।

8 Responses to “मेरी बगिया ( २ )”


  1. 1 धुरविरोधी May 12, 2007 at 4:47 pm

    हे भगवान, अफलातून जी; आप तो बहुत भाग्यवान है! ईश्वर सारे देश को आपकी बगिया जितना ही सुन्दर बनाये.

  2. 2 संजय बेंगाणी May 12, 2007 at 4:51 pm

    निमंत्रण दिया है तो आना ही पड़ेगा :)

  3. 3 Sanjeet Tripathi May 12, 2007 at 7:42 pm

    सुंदर!!!

    सचमुच आप भाग्यशाली हैं जो काशी विश्वविद्यालय के परिसर में रहते हैं।
    सालों पहले एक बार घुमने का मौका हमें मिला है

  4. 4 sunita(shanoo) May 12, 2007 at 7:50 pm

    देखो भैये बगीया दिखा-दिखाकर एसे ना तड़फ़ाओ,..
    आयें कैसे बगीया में ,जरा पता भी दे जाओ,…

    सुनीता(शानू)

  5. 5 समीर लाल May 12, 2007 at 9:12 pm

    पुनः बहुत अच्छा लगा बगिया विचरण. कभी मौका लगा तो जरुर आयेंगे. :)

  6. 6 mamta May 12, 2007 at 10:00 pm

    बगिया और बगिया मे लगे फल-फूल अच्छे लगे। फोटो अच्छी खीची है।

  7. 7 ghughutibasuti May 14, 2007 at 3:54 am

    बहुत सुन्दर चित्र लिए हैं आपने अपनी सुन्दर बगिया के । जिस फूल का नाम आप पूछ रहें हैं वह मेरे भी एक बगीचे में था । नाम तो अब याद नहीं आ रहा है । जहाँ तक मुझे याद पड़ रहा है यह एक विदेशी पौधा है । केले के जैसे पत्ते व फूल भी कुछ उसी प्रकार से लम्बे गुच्छे में आते हैं । हो सका तो ढूँढ कर नाम बताउँगी । वैसे सबसे सरल तरीका प्रो. बसु चौधरी जी से पूछना है ।
    अपनी बगिया में घुमाने के लिए धन्यवाद ।
    घुघूती बासूती

  8. 8 PRAMENDRA PRATAP SINGH May 18, 2007 at 1:44 pm

    आप जितना अच्‍छा लिखते है उसी तरह एक अच्‍छे छायाकार भी है एक से एक बडकर खूबसूरत चित्र थे। मनना पड़ेगा कि खीचने वाले की कला है।

    जितने अच्‍दे चित्र थे उससे भी अच्‍छी व्‍याख्‍या मन को भा गई है।

    निमंत्रण तो दे‍ दिया है, किसी दिन अचानक धमक पड़ेगें। :)


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