वर्षों पूर्व ‘जन्मभूमि’ गुजराती - पत्र में प्रतिसप्ताह ‘स्वातंत्र्य संग्रामनी गाथा’ स्तम्भ में श्री नारायणभाई ने बापू के सम्बन्ध में धारावाहिक रूप में संस्मरण लिखे थे , जो बाद में ‘संत सेवतां सुकृत वाधे’ शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशित हो गये । सौभाग्य से आज वे हिन्दी में रूपान्तरित होकर पाठकों के समक्ष उपस्थित हैं । २२ प्रकरणों की यह छोटी-सी पोथी गांधीजी के अनेक अनजाने अलौकिक गुणों पर प्रकाश डालती है । प्रस्तुत संस्मरणों की विशेषता श्री दादा धर्माधिकारी ने प्राक्कथन में लिपिबद्ध कर दी है । संस्मरण तो अनूठे हैं ही , लेखक की साहित्यिक प्रतिभा ने उन्हें रसाप्लुत भी बना दिया है ।
गांधी - शताब्दी के शुभ -अवसर पर हमें इस पुस्तक के प्रकाशन का सुअवसर मिला था । अब हम इस पुस्तक का दूसरा संस्करण प्र्काशित कर यह आशा करते हैं कि पाठकों को प्रथम संस्करण की भाँति निश्चय ही यह रोचक और उद्बोधक सिद्ध होगा। गुजराती-भाषी जनता ने जिस प्रकार इस श्रेष्ठ रचना का आदर किया है , हम समझते हैं कि कि हिन्दी-भाषी जनता भी इसमें पीछे नहीं रहेगी । गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता का हिन्दी-रूपान्तर करने में श्री भवानीप्रसाद मिश्र ने सहयोग दिया, अत: हम उनके आभारी हैं ।
- सर्व सेवा संघ प्रकाशन , राजघाट , वाराणसी-२२१००१.
(जून १९९६)

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