एक बार काका ने सेवाग्राम - आश्रम का वर्णन ‘ गांधीजी का प्राणि - संग्रहालय’ ( गांधीजीज मिनाझरी) इस शब्दों में किया था। बापू के आसपास हमेशा अजीब तरह के लोग जमा हो जाते थे । कभी - कभी सरदार कुछ पर चिढ़ भी जाते थे । काका हँसकर कहते थे , ‘ बापू तो डॊक्टर हैं,डॊक्टर के आसपास मरीज तो रहेंगे ही न ? ‘
सारे आश्रमवासियों की सभी विचित्रताओं का वर्णन करने का मेरा इरादा नहीं है , और उतना सामर्थ्य भी नही है । साबरमती-आश्रम में एक सज्जन तो ऐसे थे कि गिनकर ५५ रोटियाँ खा जाते । भूल से ५४ रखी गयी हों तो जोर से चिल्लाकर कहते , ‘ तुम कैसे कंजूस हो ! हमें भूखा मारना है ?’ और गलती से ५६ रोटियाँ परोसी जाँय तो तपाक से कहते , ‘ वाह तुमने क्या हमको राक्षस समझ रखा है ?’ इस तरह इनकी हालत भूखे मरनेवाले आदमी और राक्षस के बीच की पतली दीवार जैसी थी ।
दूसरे एक सज्जन सेवाग्राम-आश्रम में ऐसे थे , जिनके साथ मेरा निम्न संवाद हुआ -
‘ क्योंजी , आजकल क्या प्रयोग चल रहा है ? ‘
‘ प्रयोग तो हमारा कुछ-न-कुछ चलता ही रहता है । आजकल पानी का प्रयोग चल रहा है ।’
‘ क्या पानी उबालकर पीते हैं ‘ या जल-चिकित्सा चल रही है ? ‘
‘ नहीं भैया , खाने-पीने के प्रयोग के सम्बन्ध में चर्चा नहीं कर रहा । इस बार तो शौच के पानी का प्रयोग है । ‘
‘ यानी ? ‘
‘ यानी शौच के लिए जो पानी व्यवहार करते हैं , वह कैसे कम हो इसका प्रयोग कर रहा हूँ । ‘
‘ अच्छा ! ‘
‘ हाँ , घटाते - घटाते पाँच तोले तक पहुँचा हूँ । अपने देश के अनेक भागों में पानी की बड़ी कमी रहती है । इसमें अगर हम पानी बचा सकें तो …’
मैंने अपनी बालसुलभ उद्दंडता का लाभ लेकर उस भाई की बात बीच में ही काटकर कहा , ‘ हाँ , बैलों को तो पानी की जरूरत ही नहीं पड़ती । ‘
सेवाग्राम के आश्रमवासियों की ऐसी सारी विचित्रताओं के बावजूद एक बात उन सबमें समान थी, बापू के प्रति भक्ति । इसी एक तत्त्व के कारण वे आश्रम में टिक सके । इसी तत्त्व के परिणामस्वरूप सब आश्रमवासियों में एक परिवार-भावना का उदय हुआ और वह भावना वृद्धिंगत होती गयी । आज भी एक-दूसरे से बहुत दूर गए हुए दो आश्रमवासी दीर्घ अवधि के बाद जब भी मिलते हैं , तब अलग पड़े हुए स्वजन बहुत दिनों के बाद मिलने पर जिस आत्मीयता का और प्रेम का अनुभव करते हैं , वैसा ही अनुभव ये आश्रमवासी करते हैं ।
विचित्रताओं के साथ - साथ हरएक आश्रमवासी की विशेषता भी कम नहीं थीं । इनमें से कुछ लोगों के साथ रहने का मौका मिलना एक अपूर्व सौभाग्य ही था । ये आश्रमवासी स्वतन्त्रता की लड़ाई में बापू की वानर-सेना के सिपाही थे और शिवजी की बारात जैसे थे ।
यहाँ एक ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में लिखूँगा , जो विचित्रता के साथ - साथ विशेषताओं से भी परिपूर्ण थे । वैसे वे खुद छिपकर रहनेवालों में से थे लेकिन इतिहास में कम-से-कम एक बार तो उन्होंने ब्रिटिश सरकार को हिला दिया था । वे व्यक्ति हैं आचार्य भणसाळी । हम सबके लाड़ले भण्साळीकाका ।
एक दृश्य । किला सोनगढ़ गाँव का एक सुनसान मकान । उसमें आधा पागल और आधा साधु जैसा दीखनेवाला एक आदमी पड़ा था । एक समाजसेवक वहाँ पहुँचा ।
‘ ओहो ! भणसाळीभाई ! आपकी यह हालत ? ‘ जवाब में भणसाळीकाका ने सप्त स्वर में अट्टहास किया । लेकिन मुँह से एक शब्द भी नहीं बोले । समाज-सेवक ने उनके दोनों पाँवों के तलवों से बीस-बीस,पचीस -पचीस काँटे निकाले । उनके जख्मों को धोकर ,पीप निकालकर साफ कर दिया । ‘ यहाँ कुछ दिन आराम करो । ‘ समाज-सेवक ने विनती की । लेकिन साधु तो चलता ही भला । फिर पाँवों में से काँटे भी तो निकल चुके थे ।
‘ लेकिन आप बोलते क्यों नहीं ? ‘ कागज - पेन्सिल लेकर भणसाळीकाका ने लिख दिया , ‘ बारह साल का मौन लिया है । ‘
‘ बारह साल ! ‘
भणसाळीकाका के पास छोटा आँकड़ा कभी था ही नहीं । प्रथम बार अनशन किया ४० दिनों का । दूसरी बार किया ५५ दिनों का और तीसरी बार किया आष्टी-चिमूर के अत्याचारों के निषेध में ६३ दिनों का देशविख्यात उपवास ।
थोर की बाड पर से कूदने के प्रयोग के कारण उनके शरीर में फोड़े हो गये थे । भणसाळीकाका साबरमती-आश्रम से वर्धा के लिए निकले थे । ५५ दिनों के अनशन में मानसिक अस्थिरता आ गयी । फिर हिमालय तक पैदल सफर और और बारह वर्ष का मौन । देश की सही परिस्थिति का दर्शन उनको इस यात्रा में हुआ ।
हिमालय से वापस आते समय राजस्थान के एक देहात में बैल जहाँ बाँधते हैं , ऐसे बाड़े में उनको ठहरने कि जगह मिली । रात में जानवर का पाँव लगा । भणसाळीकाका के मुँह से अचानक शब्द निकला ‘ कौन ? ‘ तुरंत उनके ध्यान में आ गया कि मौन टूटा।
फिर सोचने लगे कि कई ऐसी तरकीब करनी चाहिए कि रात में नींद में भी मौन न टूटे । तरकीब तो सूझी, लेकिन उसको अमल में लाने वाला तरीका उनको मिला ध्रांगध्रा में । एक सुनार ने ताँबे का तार गरम करके लाल किया और भणसाळी्काका के दोनों होठों को सिल कर तार मोड़ दिया । भणसाळीकाका ने उस सुनार के उपकार माने। इसी सुनार ने प्रवाही पदार्थ मुँह में डालने के लिए एक फनेल भी बना दी । उन दिनों वे कच्चा आटा और कड़वे नीम के पत्ते खाते थे । आटा पानी में घोलकर चूस लेते थे । नीम की पत्तों को मुँह के कोने से अन्दर घुसा देते थे । साबरमती में आश्रम में बापू के साथ भेंट हुई , तब होठों के तार कटवा दिये । यह दूसरा दृश्य । ( अगली प्रविष्टी में जारी )

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