Archive for December, 2006



पूरे प्रेमीजन रे ( २ ) : बापू की गोद में

सत्याग्रह - आश्रम में भी पाठशाला थी . लेकिन कु. प्रेमाबहन कंटक हम लोगों को पढ़ाने आने लगीं , तब तक उसका हमें भान ही नही था . प्रेमाबहन के आने के कारण हमें पाठशाला के अस्तित्व का भान हुआ . पढ़ाने के काम में वे बहुत उत्साही थीं . आज मुझे उनके नाम के पूर्वार्ध का भी पर्याप्त अनुभव हुआ है . उन दिनों हम उनके नाम के उत्तरार्ध को ही सही मानते थे . हमारी इच्छा हो या न हो , वह पढ़ाये बगैर नहीं छोड़तीं . इस घटना के पांच - सात वर्ष बाद १९३७ में वर्धा में शिक्षा - शास्त्रियों के सामने बापू ने जब नयी तालीम के सम्बन्ध में विचार रखे , तब कई शिक्षा - शास्त्रियों ने कहा कि बापू के विचार में कोई नयी बात नहीं है . यदि मैं गलती नही कर रहा हूं , तो नागपुर की तरफ के एक शिक्षक ने तो यहां तक कह दिया कि ‘ ग्यान के साथ हाथ का उपयोग करने के विचार का अमल तो मैं पहले से ही करता आया हूं . बच्चे मेरे काबू में नहीं रहते हैं , तब छड़ी का उपयोग करके ग्यान के साथ हाथ का अनुबन्ध मैं करता हूं . ‘ नागपुर की तरफ के शिक्षक की नयी तालीम की यह व्याख्या प्रेमाबहन शायद बम्बई , पूना से सीखकर आयी होंगी . जब से हम उनके हाथ सौंपे गये , तब से वह भी ग्यानवर्धन के लिये अपने हाथों का प्रयोग हम पर करती थीं .

    ‘ उनके पास तो सीखना ही नहीं ‘ इस निश्चय को हम सत्याग्रही की तरह निभाते थे . कुछ - न - कुछ छोटे - बड़े प्रसंगों का निमित्त करके हम वर्ग में से या उद्योग में से गायब रहते थे . लेकिन ऐसा करते हुए जब हम पकड़े जाते , तब प्रेमाबहन तरह - तरह से सजाएं देतीं . उसमें एक समय का खाना बन्द करवाने की सजा तो आम हो गयी थी . लेकिन उपवासवीर बापू के आश्रम में एक समय का भोजन छोड़ना कोई नयी बात थोड़े ही थी . इसकी पूर्ती हम लोग आश्रम के खेतों के टमाटर आदि फल भरपेट खाकर फलाहार से कर लेते थे .

    ‘ छुट्टी मनाने ‘ का ऐसा ही एक प्रसंग था . बारिश हुई थी . सभी ऋतुओं में वर्षा ऋतु ही ऐसी कि गाती - बजाती आकर , अपने अस्तित्व का परिचय कराती है .  आश्रम में जगह - जगह छोटे - बड़े गड्ढों में पानी भर गया था . मैं घर से निकला तो था वर्ग के में जाने के लिए , लेकिन रास्ते में रीठे के पेड़ के नीचे एक डबरा मिल गया . उसमें छोटे - छोटे कीड़ों को डूबकर मरते देखा तो मेरे अन्दर का ‘ दीनबन्धु ‘ जाग उठा . पाठशाला में जाने के बदले इन उत्पीडित पिपीलिकाओं का उद्धार करने की मैंने ठान ली . रीठे का एक पत्ता लेकर उस से एक चीटी को किनारे पर रखा . एक ही चीटी क्यों ? एक साथ सब क्यों नहीं ? एक - एक करके सब चीटियों को उबार लेने की योजना थी . इस पद्धति में डबरे में डूबनेवाली चीटियों के उद्धार के साथ वर्ग के वातावरण में डूबनेवाले बाबला का भी उद्धार था .

    लेकिन इतनी आसानी से हार मान जांए तो वह प्रेमाबहन कैसी ? वर्ग में सौ फीसदी उपस्थिति होनी चाहिए , यह उनका आग्रह रहता था . इस आग्रह की पूर्ति के लिए वह सारे आश्रम का चक्कर लगा कर आ जातीं . पिपीलिकोद्धार के पुण्य कार्य में मैं एकचित्त हो गया था . तब रीठे के पेड के पीछे से आकर प्रेमाबहन ने मेरा कान पकड़ लिया . यहां गजग्राह की लड़ाई का प्रसंग नहीं बना और मैं भीगी बिल्ली की तरह प्रेमाबहन के साथ चल दिया . पता नहीं उनको क्यों मेरे कान से इतना प्यार हो गया कि वर्ग में पहुंचने तक उनके हाथों ने मेरे कान का सत्संग किया .

    उन दिनों बापू आश्रम में नहीं थे , इसलिए मैंने उनको एक पत्र लिखा . लिखा नहीं , लिखवाया . क्योंकि पत्र लिखना सीखें इसके बहुत पहले से बापू के साथ हमारा पत्र - व्यवहार चलता था . पण्डित खरे हम सबकी ओर से पत्र लिख देते और बापूजी कागज के टुकड़ों पर अपने हाथ से सबको जवाब लिखते . इस व्यवस्था के अनुसार मैंने बापूजी को पत्र लिखकर रीठे के पेड़ के नीचे जो घटना घटी , उसकी शिकायत दर्ज कर दी और यह भी पूछा कि ‘ आप अहिंसा में विश्वास रखते हैं फिर आपके आश्रम में ऐसी हिंसा क्यों ? ‘ जारी Continue reading ‘पूरे प्रेमीजन रे ( २ ) : बापू की गोद में’

पूरे प्रेमीजन रे : बापू की गोद में (३)

    बापू की लड़ाई की पद्धति का मुझे बचपन में ही अनुभव हो गया था . प्रसंग इस प्रकार था :

    शान्तिकुमार नरोत्तम मोरारजी ने बम्बई से मेरे लिए किसीके हाथ कुछ खिलौने भेजे थे . काका ( मेरे पिताजी ) जहां जाते , वहां उनके मित्र हो ही जाते थे . किन्तु उनमें से कुछ की मित्रता घनिष्ठ हो जाती . काका के साथ जिनकी घनिष्ठ मित्रता हो जाती , उनका हमारे साथ भी घरेलू सम्बन्ध जुड़ जाता था . शान्तिकुमारजी का बापू की तरह काका से घनिष्ठ सम्बन्ध था . इसलिए ये खिलौने उन्होंने मेरे लिए भेजे . साबरमती - आश्रम में यों तो खेलने को बहुत मिल जाता था , लेकिन खिलौने हमेशा नही मिलते थे . हमारे दुर्भाग्य से शान्तिकुमारजी के भेजे हुए खिलौने विदेशी थे . इसलिये हमारे पास पहुंचने के पहले ही बापू ने उन पर कब्जा कर लिया था . बापू ने अपने कमरे में दराज पर उनको रखवा दिया था . हमारी ‘ खूफिया - पुलिस ‘ को पता चल गया कि बाबला के लिए बम्बई से आये खिलौने बापूजी ने छिपाकर रखे हैं . ऐसे सरासर अन्याय के खिलाफ़ लड़ने के लिए हम लोगों ने तैयारियां शुरु कर दीं . कांग्रेस - युग का अनुकरण करते हुए लड़ाई का पहला कदम अपना प्रतिनिधि भेजकर उठाया जाय , ऐसा तय किया गया . खिलौने मेरे नाम से आये थे , इसलिए हमारे बाल - प्रतिनिधि - मण्डल की ओर से मुझे ही प्रवक्ता के रूप में चुना गया .

    उन दिनों बापू मगनकुटी में रहते थे . नित्य की तरह मेरे पिताजी बापू की बगल में बैठकर कुछ लिख रहे थे . दूसरे भी कुछ अन्तेवासी बापू के अगल - बगल बैठे थे . मोटी बा ( कस्तूरबा ) वहीं पर थीं . हमारा प्रतिनिधिमण्डल वहां जा पहुंचा .

    मैंने ही पहला वार किया , ‘ मेरे लिये बम्बई से खिलौने आये हैं , यह बात सही है ? ‘

    लड़ाई की शुरुआत में ही प्रतिपक्षी से सत्य को स्वीकार करा लेना उपयोगी होता है . बापू भी उस समय कुछ लिखने में मशगूल थे . लेकिन उन्होंने कागज पर से दृष्टि उठा कर मेरी तरफ देखा और कहा और कहा , ‘ कौन ? बाबला ? हां खिलौने के बारे में तूने जो सुना है , वह सही है . ‘

    ‘ मेरे खिलौने कहां हैं ? ‘ मेरे दूसरे प्रहार के पीछे बरामद माल का ठिकाना जानने की उत्सुकता थी , क्योंकि हमारे पास खबर पहुंची थी कि बापू ने खिलौने कहीं छिपा रखे हैं .

    ‘ वे रहे खिलौने दराज पर ‘ बापू ने उंगली से इशारा किया . तो , बरामद माल छिपा कर नहीं रखा था . अच्छी खासी डलियाभर खिलौने थे और सुन्दर इतने कि देखकर मुंह में पानी भर जाय !

   ’ ये खिलौने हमें सौंप दीजिये ‘ न्याय अपने साथ हो तो घुमा - फिरा कर बात करने की क्या आवश्यकता ? सीधे न्याय की मांग क्यों न की जाय ?

     तब बापू ने अपनी बात पेश की , ‘ तुझे मालूम है न कि ये खिलौने विदेशी हैं ? ‘ आश्रम तो स्वदेशी - आन्दोलन का पीठ - सा था . तो वहां के बच्चे विदेशी खिलौनों से कैसे खेल सकते हैं ? बापू को यह बात कहनी थी . लेकिन हम बच्चे उनकी बात समझने को राजी हों तब न ?

    ‘ स्वदेशी - विदेशी मैं कुछ नही जानता . मैं इतना जानता हूं कि खिलौने मेरे हैं . मेरे लिये वे भेजे गये हैं , इसलिये मुझे मिलने चाहिए ‘ मैंने अपना अधिकार सिद्ध करने के लिए कहा . मुझे विश्वास था कि बापू मेरे अधिकार से इनकार नहीं कर सकेंगे . लेकिन बापू ने बात को ऐसा मोड़ दे दिया , जिसकी हमने कल्पना ही नही की थी .

    ‘ हम क्या विदेशी खिलौनों से खेलेंगे ? ‘  ( जारी ) Continue reading ‘पूरे प्रेमीजन रे : बापू की गोद में (३)’

प्रभात किरणें (जारी )

बापू का आश्रम देखने आनेवालों की कमी तो थी नहीं . इन दर्शकों को देखकर कईबार उनका मजाक करने का जी होता था . एक बार एक अतिथी आये . वे आश्रम के व्यवस्थापक श्री नारणदासभाई का घर तलाश रहे थे . हम बच्चों में से किसी एक ने उनको पाखाने का रास्ता बता दिया . शायद ऐसे ही किसी कारण से मुझे एक अमेरिकन महिला को आश्रम दिखाने का काम सौंपा गया . एक बार जिम्मेदारी सौप दी , तो फिर हम उस काम आनाकानी नहीं करते थे . मैंने उस महिला को सब तरफ घुमा कर आश्रम दिखा दिया . उसके साथ के दुभाषिये की मदद से आश्रम में क्या काम चलता है , उसकी सारी जानकारी भी अपनी बुद्धी के अनुसार दे दी . एक कमरे में चक्की देख कर उस महिला को बड़ा अचरज हुआ ,लेकिन मुझे उससे भी ज्यादा अचरज यह जानकर हुआ कि इस बहन ने अब तक चक्की नहीं देखी है . मैंने चक्की चलाकर उसकी खूबी बताई . वह बहन खुश हो गयी और तुरन्त उसने मेरा फोटो उतार लिया . हम वहां से आगे बढ़े , तो उस बहन ने मुझे दो आने देने चाहे . मैंने लेने से इन्कार किया . उस बहन ने बहुत आग्रह किया , लेकिन मैं टस से मस नही हुआ . ‘यह तो खुश हो कर देना चाहती है , इसलिए ले लो ‘ दुभाषिये ने मुझे समझाने की कोशिश की . मैंने दुभाषिये से कहा , ‘ मैं पैसे के लिए इस बहन को आश्रम नहीं दिखा रहा हूं . बापू ने यह काम मुझे सौंपा , इसलिए कर रहा हूं . आपको पैसा देना हो तो आश्रम के व्यवस्थापक को दीजिये . मैं नहीं ले सकता . ‘
समाजशास्त्र का यह पाठ मुझे किसीने कभी सिखाया हो , यह याद नहीं पड़ता . एक मेहमान को आश्रम दिखाने का काम सौंपकर मुझ पर जो विश्वास रखा गया , उसीने यह पाठ मुझे सिखाया . लेकिन मैं यह दावा नहीं कर सकता कि किसी प्रकार की लांच-रिश्वत से मैं अछूता था .
सत्याग्रह - आश्रम में सी. आई. डी. के लोग सरकार की ओर से बराबर आते रहते थे . उसमें एक इस्माइलभाई नाम का खूफिया पुलिस था . हट्टा - कट्टा , श्यामवर्ण का ,और सिर पर रोएंदार टोपी . हम बच्चों को वह बहुत प्यारा लगता था . हम पर वह रिश्वत का सफल प्रयोग करता था . यह निश्चित रूप से नहीं कह सकता कि वह केवल रिश्वत देता था या साथ - साथ लाड़-प्यार भी करता था . इस्माईलभाई हमेशा हमारे लिए पिपरमिण्ट की गोलियां ले आते . इसके बदले में हमेशा वह एक जानकारी लेना चाहता था - ‘आजकल गांधीजी क्या करते हैं , मुझे नहीं बताओगे ?’
पिपरमिण्ट की गोली से मुंह मीठा करके थोड़ी-सी जानकारी दे देने में हमें संकोच नहीं होता था . ‘ आजकल बापूजी कडुवे नीम की पत्ती की चटनी बनाने का प्रयोग कर रहे हैं ‘ , हमने एक बार कहा . और वह भला आदमी अपनी नोटबुक में बड़ी सावधानी से यह बात नोट कर लेता था . सत्य के प्रयोग करनेवाले बापू को इधर कोई सामाजिक जटिल समस्या हल करने जितना रस कडुवे नीम की पत्ती की चटनी बनाने में लगता था , तो उधर ब्रिटिश सरकार के इस बेचारे प्रतिनिधि को किसी गुप्त सभा की रिपोर्ट की नोंद लेने जितना मह्त्व इस गुप्त रसायन के अनुपान की नोंद करने में लगता था . गांधीजी का कौन-सा प्रयोग किस दिन सरकार को खतरे में डालनेवाला साबित होगा , क्या भरोसा ! चुटकीभर नमक बनाने से दिल्ली की सरकार का सिंहासन डगमगा जायगा , यह कौन जानता था ?
ये सारे प्रसंग दाण्डीकूच के पहले के हैं . उस समय मेरी उम्र मुश्किल से छह वर्ष थी . लेकिन उस समय आश्रम के वातावरण में ही ऐसी राजनीतिक जागृति थी कि अन्य बच्चों की अपेक्षा आश्रम के बच्चे जेल , पुलिस , खुफिया पुलिस , न्यायालय इत्यादि के अर्थ बहुत जल्दी समझ लेते थे . आश्रम मे सी. आई . डी . के लोग बराबर आते - जाते थे . इसलिए आश्रम के बड़े लड़कों  में से कुछ ने हम बच्चों को सचेत कर दिया था कि खबरदार ! कभी कई खबर उन लोगों को न देना . कुछ लोग हमारे सामने ऐसी भी कुछ बातें करते थे कि जिससे हम बच्चों के मन पर यह छाप पड़ती कि अंग्रेज अपने दुश्मन हैं . आश्रम में जो गीत कान में पड़ते , उनमें ये थे :
” मारो नहीं , मरना सीखो रे ,
यही गांधीजी का मंत्र .
मन्दिर ही मानो तुम जेल को ,
तुम होगे स्वतंत्र रे .. “

इन कड़ियों के साथ ही
” तकली नहीं यह तीर है ,
सरकार की छाती चीर दे .
बोलो बिरादर जोर से ,
इन्क़लाब जिन्दाबाद .. “
या -
” सा’ब, टोपावाले !
सा’ब टोपावाले !
मेरे मुल्क में कैसे आये ? “
इस तरह के गीत भी चलते . लेकिन कुल मिलाकर देखा जाय तो मेरे मन में किसी अव्यक्त सरकार नाम की शक्ति के विषय में शायद कुछ गुस्सा था , लेकिन उस सरकार के काले - गोरे या छोटे - बड़े किसी भी प्रतिनिधी के विषय में क्रोध नहीं था . बल्कि इस्माइलभाई जैसे और भी जो लोग हमारे परिचय में आये थे , उनके साथ हमारी सांठ-गांठ हो जाती थी . इसमें हमारे बाल-स्वभाव का हिस्सा जितना था ,उतना या उससे अधिक हिस्सा था बापू की लड़ने की पद्धति का .
इस लडाई के एक उज्जवल प्रसंग की धुंधली छाप मेरे मन पर पड़ी थी , उसका भी जिक्र यहां कर दूं .
लाहौर के कांग्रेस- अधिवेशन के बाद बापू ने वाइसराय को ११ मुद्दों वाला प्रसिद्ध पत्र लिखा . तब से सारे देश मे लड़ाई के नगाड़े बजने लगे थे . आश्रम में राजनीतिक लोगों का आना-जाना बढ गया था . जब से बापू ने जाहिर कर दिया कि वे १२ मार्च १९३० को दाण्डी की ओर कूच करेंगे और वहां पहुंच कर नमक बना कर कानून भंग करेंगे , तब से उनके इस कदम पर तरह तरह की अटकलबाजियां लगायीं जाने लगीं . श्री मोतीलाल नेहरू ने भी इस कदम की बुद्धिमानी के विषय में शंका व्यक्त की . आश्रम में यह अफवाह थी कि उस दिन के पहले ही शायद बापू को सरकार पकड़ लेगी .
दूसरे दिन से प्रार्थना नदी के रेतीले तट पर होने लगी . ११ मार्च को रात - भर लोगों की भीड़ जमा होती रही . सुबह इमली के पेड़ के नीचे देखते हैं कि मोटरों का तांता लगा है . शायद ही कोई अहमदाबाद की मोटर होगी , जो वहां न आई हो . बापू के साथ कूच में कौन कौन रहेंगे , इस विषय में आश्रम में बड़ी सरगरमी थी . चुने गये ७९ लोग फूले नही समाते थे , बाकि के लोग ‘ हमारी भी बारी आएगी’ यह आशा लगाये बैठे थे . हम बच्चों को इस तरह का कोई मौका तो था नहीं . सुबह पण्डितजी को प्रार्थना-भूमि तक जाने ही नहीं दिया , रास्ते में ही उनको घेर लिया गया . पण्डितजी ने धुन गाना शुरु किया: “रघुपति राघव राजाराम.” जहां तक मैं समझता हूं शायद इसी समय से यह धुन गांधी-धुन के नाम से प्रसिद्ध हो गयी . प्रार्थना में पण्डितजी ने भजन सुनाया : ” जानकीनाथ सहाय करें तब कौन  बिगाड़ करे नर तेरो . ” क्योंकि ‘ वैष्णवजन’ वाला पद कूच के समय गाया जाता था . गांधीजी इस तरह कूच का प्रारम्भ करेंगे . यह देखने के लिए लाखों की भीड़ तरस रही थी . लेकिन प्रार्थना की बाद बापू बीमारों को देखने गये .चेचक के कारण तीन बालकों की उस समय मृत्यु हो गयी थी . उनमें पण्डितजी का लडका बसन्त भी था .फिर भी पण्डितजी कूच में आगे - आगे थे .प्रेमाबहन दाण्डी कूच का दृश्य देख कर बावरी हो गयीं . बापू जिस शाल को ओढ़े हुए थे उस पर प्रेमाबहन ने एक बिल्ला लटका दिया और वह उनसे लिपट गयीं . शायद मणिबहन पारिख ने तिलक किया , सूत की गुन्डी पहनायी गयी और वैश्णवजन के साथ राम-धुन गाते हुए बापू निकल पडे . उनके साथ ठेठ असलाली तक सारा अहमदाबाद शहर उमड़ पड़ा .
पीछे आश्रम में हम बच्चे रह गये . बापू के जाने के बाद सुबह छ: बजे हम लोग झण्डा आदि ले कर जेल की तरफ ( दाण्डी कूच की उलटी दिशा में) निकल पड़े और हम ने कूच का आनन्द मनाया .

बापू की गोद में (२): प्रभात - किरणें

    कुछ समय के लिए बापू ने साबरमती के सत्याग्रह आश्रम का नाम बदलकर ‘ उद्योग - मन्दिर ‘ रखा था . ‘ सत्याग्रह - आश्रम ‘ नाम शायद भारी मालूम हुआ हो . ‘ उद्योग मन्दिर ‘ नाम उससे कम महत्वाकांक्षावाला और अधिक वास्तववादी कहा जाएगा . फिर भी संस्कृत भाषा और बापू की पसन्दगी , दोनों में यह खूबी थी कि ‘ आश्रम ‘ शब्द में ‘ श्रम ‘ शब्द था और ( मन्दिर को छोड़ दें तो भी ) ‘ उद्योग ‘ में योग शब्द था ही .

    आश्रम के एक स्थान का मूल नाम कायम रहा था - प्रार्थना - भूमि . आज जिसको उपासना - भूमि कहा जाता है , उस स्थान को सत्याग्रह - आश्रम से छोटी संग्य़ा बापू दे नहीं सके .

    कैसे दे सकते थे ? सत्याग्रह के विचार का जन्म ही प्रार्थना की भूमिका में से हुआ था . उस स्थान पर बापू का सत्याग्रही जीवन सोलह कलाओं से प्रकट होता था . प्रार्थना में जब केवल आश्रमवासे रहते , तब उनके एक - एक प्रश्नों को ले कर सत्याग्रही के नाते उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए , इस सम्बन्ध में बापू मार्गदर्शन करते थे . उनके विचार में सत्याग्रह महज अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ने का शस्त्र नहीं था . सत्याग्रह तो सत्य की खोज करनेवाले की सपूर्ण जीवन - पद्धति थी . इसीलिए जीवन के हर पहलू की परीक्षा प्रार्थना - भूमि में सत्याग्रह की कसौटी पर की जाती थी . उठने में देर क्यों हो जाती है ? प्रार्थना में झपकी क्यों लग जाती है ? स्वप्नदोष क कारण क्या है ? क्या क्रोध दु:साध्य रोग है ? क्या आश्रमवासियोंको जेवरों की आवश्यकता है ? आहार का परिणाम मन पर कितना कितना होता है ? इत्यादि कई व्यक्तिगत प्रश्नों की छानबीन बापू प्रार्थना के बाद करते थे .  इसी भूमि पर से बापू ने गीता पर प्रवचन भी किए थे . और दाण्डीकूच के समय लोगोंकी भारी भीड़ के कारण उपासना - भूमि की जगह छोटी पड़ी , तो साबरमती नदी के विशाल रेतीले तट का उपयोग करना पड़ा . पण्डित खरे की सागर - गम्भीर संगीत - ध्वनि , जो जड़ को भी दोलायमान करनेवाली थी , उस समय की मेदिनी के सामने अपर्याप्त साबित हुई .

    स्थल भी कितना रमणीय था ! एक ओर हृदयकुंज , दूसरी ओर दत्त - मन्दिर , तीसरी ओर वह नदी ,जो गरमी के मौसम में अन्त:स्रोता फलगू की तरह रुक्ष रेतेली , तो बारिश में तूफ़ानी बाढ़ से घों - घों करनेवाली , लेकिन बारहों मास उपासना - भूमि का पद - प्रक्षालन करते हुए अखण्ड बहती हुई साबरमती नदी !

    लेकिन इस प्रार्थना - भूमि के साथ मेरे बचपन के संस्मरण ( ४ से ७ वर्ष की उम्र तक के ) जाड़े के दिनों में उस भूमि पर क्रीड़ा करते हुए चकवे , मैना और मोरों की तरह ही खिलवाड़वाले हैं .

    बापू उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे बैठते थे . बापू की एक ओर  बहनें और दूसरी ओर भाई बैठते थे . मैं प्रार्थना में जाने लगा , तब से ही मैंने अपना स्थान खोज लिया था . बहनों या भाइयों की पांत में बैठने के बदले मैंने बापू की गोद में बैठना शुरु किया . उस तथ्य के बारे में आज सोचता हूं तो लगता है कि वह कितना बड़ा भाग्य था और साथ ही कितनी जिम्मेदारियों से भरा था . लेकिन उस समय वहां जाकर बैठने का कारण शायद यही था कि सारी प्रार्थना का , आश्रम का और हमारी सारी दुनिया का केन्द्रस्थान बापू की गोद थी .

    कुछ दिनों बाद मेरा एक प्रतिस्पर्धी खडा हुआ . भाई प्रबोध चौकसी आश्रम में अपने नाना के पास कुछ दिन रहने आया . तब वह भी बापू की गोद में बैठने लगा . तब तक आश्रम में सब बच्चों में छोटा मैं ही था . लेकिन प्रबोध मुझसे भी छोटा था . इसलिए उसका हक नामंजूर हो ही नहीं सकता था . हम दोनों को अगल - बगल बैठाकर बापू ने समस्या का हल निकाल लिया .

    लेकिन कुछ दिनों बाद बढ़ती हुई और हमें सबके साथ प्रार्थना में ठीक ढंग से बैठने को कहा गया . हम बच्चे दोनों तरफ़ का लाभ उठाते . कभी भाइयों की कतार में बैठते तो किसी व्यक्ति-विशेष को चुनकर उनकी नकल करने में अपनी सारी सारी एकाग्रता का उपयोग करते थे . जब बहनों की कतार में बैठते तो भगवान के साथ तद्रूप बनने की इच्छा रखनेवाली साथ - साथ बैठी दो बहनों की चोटियां धीरे से जोड़ देने में हम सार्थकता का अनुभव करते थे .

    क्या आश्रम में एक भी बात ऐसी होती होगी , जो बापू के पास न पहुंचे ? ‘ बापू, आज खजूर का आधा फल अधिक खाया गया’, ‘गरम पानी से नहाना अच्छा या ठंडे पानी से?’ इत्यादि अनेक बातों का निर्णय बापू के द्वारा होता था . फिर हमारा यह नटखटपन तो शिकायत करने लायक था . उसको बापू के पास पहुंचने में देर ही क्या थी ? ‘ बापू यह बाबला ,धीरू और धर्मकुमार प्रार्थना के समय हमें सताते हैं . ‘

    हम मन में सोचते कि अब अदालत बैठेगी और वकील , गवाहों की जरूरत पड़ेगी . असहयोगियों की तरह हम अपना गुनाह सीधे - सीधे स्वीकार कर लें तो कैसा रहेगा ?

    लेकिन हमें अधिक देर इस सम्बन्ध में माथापच्ची नहीं करनी पड़ी . हमसे जवाबतलब न करते हुए बापू ने कह दिया कि ‘ अपनी प्रार्थना में इन बच्चों को क्या रस आता होगा ? उनके लिए अलग प्रार्थना की व्यवस्था करो . ‘

    मन में था वही मानो बैद ने बता दिया . लेकिन सच कहूं ? हमारी प्रार्थना में और क्या होता था यह तो आज याद नहीं है , लेकिन इतना जरूर याद है कि प्रार्थना के अन्त में रामायण की कथा सुनाई जाती थी . इसमें भी किष्किन्धा-काण्ड और लंका-काण्ड को छोड़ और कुछ भी याद नहीं है ,यह भगवान की कसम खा कर कह सकता हूं . रात को हम प्रार्थना में जो भी सुनते थे या बोलते थे ,उसकी छाप हमारे दैनन्दिन जीवन पर बड़ों की अपेक्षा अधिक जल्दी और गहरी पड़ती थी . मेरी मां पर उस समय आश्रम के कोठार ( भण्डार ) की किम्मेवारी थी . इससे पहले जिन भाइयों ने कोठार संभाला था, उनकी हर रोज हिसाब में कुछ-न-कुछ भूल रह जाती थी. लेकिन जब से बहनों ने काम संभाला,हिसाब बिलकुल ठीक मिल जाता था, इसकी मेरी मां को साभिमान खुशी थी .इसमें काम बहुत करना पड़ता था . एक दिन मां थकी-मांदी बड़ी देर से कोठार से आ रही थी कि आनन्द-निवास के फाटक के पास उसने बाबला को अलकतरा से हाथ-मुंह काला किये बड़े ठाठ के साथ बैठे देखा .

    ‘ हाय राम , यह तूने क्या किया ?’ मां ने अकुलाकर कहा .

    छोटे-छोटे चीथड़ों को एक - दूसरे से बांधकर लंकापति रावण के सिंहासन जितनी लंबी बनायी हुई लंगोटी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा , ‘ मारुति बना हूं,मारुति’ .

    यों तो बापू को हमारा यह नटखटपन अच्छा लगता था, बल्कि कभी मौका पा कर बापू हमारे साथ  खेल भी लेते थे .  लेकिन कभी - कभी वे हम पर दूसरी शिक्षा - पद्धति का भी प्रयोग करते थे और उसमें सफल भी होते थे . जो कोई सुबह देर से उठता था,उसको उठने की घण्टी बजाने का काम सौंपना यह बापू का इलाज सबको मालूम हो गया था .इसी तरह हमें कुछ-न-कुछ जिम्मेवारी का काम सौंपकर हमारे उत्साह और उधम को लगाम लगाने का काम बापू करते थे . ( जारी )

बापू की गोद में : ले. नारायण देसाई

मंगल मन्दिर खोलो !  (प्रथम अध्याय)

  साबरमती का सत्याग्रह - आश्रम एक सांकेतिक स्थान पर बना हुआ है . किंवदंती है कि प्राचीन काल में इन्द्र के वज्र के लिए अपनी अस्थियां समर्पित करनेवाले दधीचि ऋषि का आश्रम इसी स्थान पर था .  प्राचीन काल के इस ऋषि के आत्माहुति की कहनी जितनी अदभुत है , उससे कम रोमहर्षक अर्वाचीन काल में उसी स्थान पर आश्रम की स्थापना करनेवाले महात्मा की गाथा नहीं है .

   बापू कई बार कहते : ‘मेरा आश्रम बहुत अच्छे स्थान पर बना है . एक ओर दूधेश्वर ( श्मशान ) है तो दूसरी ओर जेल . इस आश्रम में रहनेवालों के लिए जेल कोई नई बात नही है , वैसे दूधेश्वर - श्मशान भी कोई डर की बात नहीं होनी चाहिए . ‘ कोई अन्तेवासी बापू की बात को पूरी करते हुए कह देगा : ‘हां बापू , और आपके आश्रम के बिलकुल सामने ही मिल के ये भोंपू खड़े हैं . वे याद दिला रहे है कि खादीवालों को किसका सामना करना है . ‘

   बापू के मेरे प्रथम स्मरण के साथ ही साबरमती - जेल का स्मरण भी जुड़ा है . सुबह - शाम टहलने के लिए बापू निकलते . साथ में चलनेवालों के कंधों पर बापू हाथ रख देते . जिनके कंधों पर बापू हाथ रखते थे , वे ‘ बापू की लकड़ी ‘ बन जाते . ऐसी मानव-लकड़ी के सहारे चलने में बापू को क्या आराम मिलता होगा यह तो वे ही जानें , लेकिन ‘ लकड़ियां ‘ उसमें गर्व का अनुभव अवश्य करतीं थीं . बापू के दोनों ओर चलते की होड़ में कभी - कभी लकड़ियों को टकराते हुए भी मैंने देखा है .

   छोटे होने के नाते लकड़ी बनने में हमारी पसन्द पहले होती थी . रोज सुबह - शाम बापू के निवास - स्थान , मगनकुटी , या हृदयकुंज से निकलकर साबरमती सेण्ट्रल - जेल के दरवाजे तक जाकर वापस आने का रिवाज था .

   वैसे भी हम लोगों की अपेक्षा बापू तेज ही चलते थे . लेकिन जेल का फाटक नजदीक आया हो और उस समय किसीके साथ गंभीर बात न चलती हो तो आखिर के पचास गज का यह फासला बापू मानो दौड़ लगा कर तय करते थे . कभी - कभी हम लोग बापू का हाथ अपने कंधों से हटा कर दौड़ते-दौड़ते आगे पहुंच जाते थे . ध्येय तक पहुंचते समय गति तीव्र करने में कुछ और ही मजा आता था . कभी -कभी हम ऐसा करने जाएं , उसके पहले ही बापू हमारे कंधों पर अपना पूरा भार डालकर पांव ऊपर उठा लेते और कहते , ‘क्यों सेठजी , अब दौड़ो , देखें !’ हरएक प्रेमीजन की तरह बापू को भी अपने प्रेम - पात्र को दुलार का नाम देना और बीच - बीच में उसे बदलते रहना अच्छा लगता था . इस प्रकार के मिले लाडले नामों में मेरा एक नाम ‘सेठिया’ था . इस शब्द में विनोद अवश्य छिपा है , लेकिन आज इस नाम के साथ आम तौर पर जो भावना मन में आती है , वैसी कोई भावना उस समय मेरे दिमाग में नहीं उठती थी .

     लौटते हुए बापू आम तौर से किसी बीमार आश्रमवासी को देखने जाते . रोज दोनों समय बापू की इस भेंट के कारण कुछ आश्रमवासियों को अपनी बीमारी भी एक भाग्य जैसी लगती होगी . बीमारों को इस तरह देखने में अनायास बापू की आश्रम - परिक्रमा हो जाती थी .

   उस समय के सत्याग्रह-आश्रम में और आज के हरिजन - आश्रम में काफ़ी अन्तर है - बाहरी दर्शन में और वातावरण में भी . आज की अपेक्षा उस समय का आश्रम बाहर अधिक छोटा और जंगल जैसा था . वातावरण की दृष्टि से वह बहुत ही स्वच्छ और शान्त था . मगनकुटी और हृदयकुंज के बीच आज की तरह  ही प्रार्थना - भूमि तो थी , लेकिन मगनकुटी और प्रार्थना - भूमि के बीच नदी का पक्का घाट नहीं था . वहां दत्तात्रेय का एक छोटा-सा मन्दिर था,वह आज भी है;लेकिन उसका मह्त्व घट गया है . उन दिनों वहां साल में एक बार शायद गुरु-पूर्णिमा के दिन, रात को देर तक पंडित खरे के नेतृत्व में संगीत - संकीर्तन का जलसा ही लग जाता था . प्रार्थना-भूमि पर आज नीम का एक ही पेड़ है,उन दिनों तीन थे . उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे प्रार्थना के समय बापू बैठते थे . दूसरा पेड़ पूर्व की तरफ ठेठ नदी के किनारे था . साधु सुरेन्द्रजी आश्रम में नये-नये आये थे,तब इस पेड़ के नीचे उनका तरु-तलवास रहता था . आज ये दोनों पेड़ साबरमती की बाढ़ में विलीन हो गये हैं. नदी के घाट के पश्चिम में,आज जहां गांधी-संग्रह के आधुनिक लेकिन सादगीपूर्ण मकान हैं, वहां पहले खेत था . उन दिनों इस भाग का वातावरण बिलकुल ही दूसरा था -अधिक ग्रामीण और अधिक अकृतिम . (  जारी,पढ़ें) Continue reading ‘बापू की गोद में : ले. नारायण देसाई’

जुगनू : अल्लामा इक़बाल की बाल कविता

सुनाऊं तुम्हे बात एक रात की,

कि वो रात अन्धेरी थी बरसात की,

चमकने से जुगनु के था इक समा,

हवा में उडें जैसे चिनगारियां.

पडी  एक बच्चे की उस पर नज़र ,

पकड़ ही लिया एक को दौड़ कर.

चमकदार कीडा जो भाया उसे ,

तो टोपी में झटपट छुपाया उसे.

तो ग़मग़ीन कैदी ने की इल्तेज़ा ,

‘ओ नन्हे शिकारी ,मुझे कर रिहा.

ख़ुदा के लिए छोड़ दे ,छोड़ दे ,

मेरे कैद के जाल को तोड दे .

-”करूंगा न आज़ाद उस वक्त तक ,

कि देखूं न दिन में तेरी मैं चमक .”

-”चमक मेरी दिन में न पाओगे तुम ,

उजाले में वो तो हो जाएगी गुम.

न अल्हडपने से बनो पायमाल -

समझ कर चलो- आदमी की सी चाल”.

-अल्लामा इक़बाल.

नल की हडताल

आज सुबह से नल था मौन्,
पता नहीं कारण था कौन ?
मैंने पूछा तनिक पास से ,
भैय्या दिखते क्यों उदास से ?
बोला , ‘क्या बतलाऊं यार ,
रोज सहन सहन करता हूं मार .
कान ऐंठता जो भी आता ,
टांग बाल्टी मुझे सताता .
लडते मेरे पास खडे हो ,
बच्चे हों या मर्द बडे हों .
नहीं किसी को दूंगा पानी !
इसीलिए हडताल मनानी !

पास रखी तब बोली गागर ,
‘ हम हैं रीते,तुम हो सागर ,
जल्दी प्यास बुझाओ मेरी ,
सोच रहे क्या ? कैसी देरी ?

नल को दया घडे पर आई,
पानी की झट धार बहाई ..
(कवि- अज्ञात,किसी को पता हो तो जरूर बताए.)

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