१९३० - ‘३२ की धूप - छाँह : बापू की गोद में (६ )

[..किसी आन्दोलन में खुले तौर पर स्त्रियों के शामिल होने की घटना भारत के इतिहास में एक नयी परम्परा डालने वाली थी... गंगाबहन की खादी की शुभ्र साड़ी उनके सिर पर से बहने वाली ख़ून से केसरिया रंग की बन गयी .]

                    भट्ठी की करामात देखो मेरे भाई .

                     भले - लोग दीवाने बन फिरें भाई ..

    साबरमती - जेल के पीछे साबरमती गाँव की शराब - भट्ठी के सामने खड़ी रहकर आश्रम की बहनें शराब - विरोधी गीत , जो सूरत जिले से लेकर यहाँ तक गाया जा रहा था , गा रही थीं . यह बहनें क्या करती हैं और इनके साथ क्या होता है , यह देखने के लिए अहमदाबाद शहर से प्रेस - रिपोर्टरों के साथ काफी भीड़ इकट्ठा हुई थी . इन बहनों में से एक की उँगली पकड़ कर मैं यह दृश्य देख रहा था और बीच - बीच में एकाध गीत के साथ अपना सुर मिला देता था -

                  शराब ने सब चौपट कर दिया

                   हे शराबी ! तू छोड़ दे न शराब !

    स्वातन्त्र्य - संग्राम का एक नया अध्याय मेरे बाल - नयनों के सामने शुरु हो रहा था .

    कई लोगों के मन में शंकाएँ थीं कि गांधीजी के इस नये कार्यक्रम का क्या नतीजा होगा . मणिबहन परीख पिकेटिंग ( धरना ) करने निकली , तब अहमदाबाद शहर के उनके रिश्तेदारों और स्नेही - सम्बन्धियों के मन में यह डर था कि कहीं शराबी लोग नशे में इनका अपमान न कर बैठें . लेकिन बापू ने आश्रम की बहनों में वीर- श्री का कुछ अद्भुत संचार कर दिया था . दाण्डीकूच के बाद सत्याग्रह - आन्दोलन में शायद यह सबसे बड़ा कदम कहा जाएगा . किसी आन्दोलन में खुले तौर पर स्त्रियों के शामिल होने की घटना भारत के इतिहास में एक नयी परम्परा डालनेवाली थी . शराबबन्दी का कार्यक्रम स्त्रियों के लिए बिलकुल नया - सा था . लेकिन इसने आश्रम की ही नहीं , बल्कि गुजरात की और सारे भारत की स्त्रियों को देश के सामाजिक जीवन में एक गौरवपूर्ण स्थान दे दिया .

    उन दिनों आश्रम में बड़ी चहल - पहल थी . दाण्डीकूच के हर पड़ाव से नये - नये समाचार आते रहते थे . इधर अहमदाबाद में काका की सभाओं में लाखों की संख्या में लोग आते थे . बिना लाउडस्पीकर के उनके भाषण होते . सभाओं में बोलने या सुनने की अपेक्षा देखने की जिग्यासा ही अधिक रहती थी . और देखने की अपेक्षा क्षणभर में चुटकीभर नमक हजारों रुपये दे कर नीलामी में खरीदने और सरकार की नाराजी मोल लेने का महत्त्व अधिक था .

    आश्रम की बहनों की एक टुकड़ी ने आश्रम की वयोवृद्ध महिला गंगाबहन के नेतृत्व में खेड़ा जिले में हँसते हुए लाठियों के प्रहारों को झेला . गंगाबहन की खादी की शुभ्र साड़ी उनके सिर से बहनेवाले खून से केसरिया रंग की बन गयी . लीलाबहन आसर को बोरसद के पुलिस - थाने में अकली बुलाकर दारोगा या तत्सम पुलिस अफसर ने गालियाँ सुनाईं . आम तौर पर किसीका एक शब्द भी बरदाश्त न करनेवाली मेरी ‘ लीला बूआ ‘ ने हँसते हुए उन गालियों को सहा . भारत - कोकिला सरोजिनी नायडू ने धारासणा के नमक के ढेरों के पास कड़ी धूप में दिनभर खड़ी रहकर प्राचीन तपस्विनियों के आधुनिक स्वरूप का दर्शन कराया . इस तरह के अनेक उदाहरणों द्वारा भारत का नारीत्व जाग उठा . सत्याग्रह - आन्दोलन में महिलाओं को शरीक करके बापूजी ने राष्ट्रीय - आन्दोलन को एक नया पैमाना दे दिया .

    हर रोज लड़ाई के मैदान से आनेवाले समाचारों से आश्रम गूँज उठता था . आश्रम मानो एक सैनिक पड़ाव - सा बन गया था . जेल से छूटकर बापूजी थोड़े दिन के लिए आश्रम में आए थे . अपने यग्य में वे एक के बाद एक आहुतियाँ चढ़ाते जा रहे थे .

    एक दिन उन्होंने आश्रम की बहनों की सभा बुलाई . हम बच्चों को उसमें नही आने दिया . लेकिन सभा में क्या हो रहा है  , इसकी खबर हमारे कानों तक पहुँचे बिना नहीं रही . इस सभा में आश्रम की बची बहनों को बापू जी ने जेल जाने का आह्वान किया.

हमारे जैसे बच्चों की माताओं को भी उसमें शामिल कर लिया था . बापू का आह्वान यानि सारे देश का , अपमानित मानव - जाति का आह्वान ! इसका इनकार करने का सवाल ही नहीं था . लेकिन माँ और पिताजी , दोनों के जेल में जाने का प्रसंग मेरे लिए पहला ही था . यह दिक्कत सिर्फ़ मेरी नहीं थी , पिताजी और माँ की भी थी . वे दोनों मेरी खास व्यवस्था कर देने की फ़िकर में थे . आश्रम के बच्चों को अपने हरिजन - कन्या - छात्रालय में रख लेने का सुझाव अनसूयाबहन ने दिया था . लेकिन हम लोगों की पढ़ाई ठीक से चलती रहे , इस ख्याल से नरहरीभाई और पिताजी ने हम तीनों ( आनन्दी , मोहन , बाबला ) की रहने की व्यवस्था स्व . रामनारायण वि. पाठक के घर पर कर दी थी . अधिक सहूलियत की यह जगह होते गुए भी हम अन्य बच्चों से अलग रहने को तैयार नहीं थे . एक रात हम रामनारायण काका के वहाँ ठहरे . लेकिन उस सारी रात मैं रोता रहा . दूसरे दिन हमको सब बच्चों के साथ अनसूयाबहन के यहाँ पहुँचा दिया गया . अनसूयाबहन और शंकरलालभाई के असीम प्यार के बावजूद इस जगह हमें काफी असुविधाओं का सामना करना पड़ा .

    ‘कौओं - कुत्तों की मौत मरूँगा, लेकिन स्वराज्य - प्राप्ति तक आश्रम में फिर से पाँव नही रखूँगा ‘ इस तरह की भीष्म - प्रतिग्या करके बापू फिर से जेल चले गये . सरकार किसानों की जमीन जप्त कर रही हो , तब आश्रम अपनी सम्पत्ति को क्यों सुरक्षित रखे ? य़ह उनकी दलील थी . और बापू ने सरकार को पत्र लिखकर स्वेच्छा से आश्रम सरकार के हवाले कर दिया . आश्रम का पुस्तकालय अहमदाबाद की नगरपालिका को सौंप दिया . आश्रम के पुस्तकालय में दक्षिण अफ़्रीका से साथ लायी बापू की किताबें और काका की किताबें मिलकर करीब दस हजार किताबें थीं . आश्रम के अधिकांश भाई - बहन जेल चले गये . अन्य लोग अपने - अपने प्रदेश में काम करने चले गये . उस समय आश्रम की हालत वैसी ही हो गयी , जैसे कुंजबिहारी के अभाव में बृज की हो गयी थी . आश्रम की गायों ने तो इसका प्रत्यक्ष प्रमाण दिया . आश्रम के पास पिंजरापोल ( कांजी हाउस ) में उन गायों को लिवाया जा रहा था , तब ‘हम्मा’ ,’हम्मा’ पुकार कर वे आश्रम में वापस भाग आतीं और आश्रम की भूमि को रौंदने तथा नाक से जमीन सूँघने लगतीं . अनसूयाबहन के यहाँ से हम एक बार सूने पडे हुए इस आश्रम को देखने गये थे . वहाँ का दृश्य देखकर ही रोना आता था . कभी हमारे खेल - कूद से और गानों से गूँजता हुआ आश्रम इस समय सूनसान पड़ा था . आश्रम के मकान मानो खाने को दौडते थे . कुछ मकानों के दरवाजे या खिडकियाँ टूट चुकी थीं . प्रेमाबहन की देखभाल में हमेशा साफ-सुथरे रहनेवाले आँगनों में जगह - जगह ऊँची घास उग कर सूख भी गयी थी . हृदयकुंज का हृदय गायब था . हम वहाँ ज्यादा समय ठहर ही नहीं सके . आश्रम के इमली के पेड़ के नीचे थोड़ी देर बैठे रहे . वह पेड़ आश्रम की स्थापना से पहले का था . आश्रम में वह सबसे बड़ा वृक्ष था . इसने अपनी छाया में बापू और उनके साथियों के तम्ब्बुओं को लगते देखा था . धीरे - धीरे तम्बुओं की जगह एक - एक पक्का मकान खड़ा देखा था . कई बार इस वृक्ष के नीचे जेल की काली मोटर खड़ी रहती थी . अनेक बार अहमदाबाद के सेठों की मोटरें भी वहाँ पहुँचती थी . इसी वृक्ष की छाया में से डाण्डीकूच का प्रारम्भ हुआ था . तब आश्रमवासियोंने बापू को गौरवपूर्वक बिदा किया था. कुछ देर हम वहाँ गुमसुम बैठे रहे . हमारे खयाल से हमारे ये नि:श्वास वह वृक्ष भी समझ गया होगा .

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