[ ..जेल में नहीं रहते थे , तब रेल में रहते थे ... मेरे शैशव का पूरा काल , मुझे ऐसा जान पड़ता है , मानो वह हमारे बुजुर्गों की जेल - यात्राओं और दो जेल यात्राओं के बीच का काल हो . ]
पिताजी को मैं ‘ काका ‘ कहता था . आगे के सब प्रसंगों में उनका जिक्र मैं ‘ काका ‘ के नाम से ही करूँगा . मेरे लिए वही नाम स्वाभाविक है . बचपन में बापू क्या , और काका क्या , दोनों हमारे लिए मेहमान जैसे ही थे . साबरमती - आश्रम उनका हेड क्वार्टर था , लेकिन वहाँ वे जम कर रहें तब न ! जेल में नहीं रहते थे तब रेल में रहते थे .
काका घर आये हैं , माँ कोई खास चीज बनाने की तैयारी में है , और उसी समय मैं काका से पूछता हूँ , ‘आप वापस कब जायेंगे ? ‘
काका हँसकर जवाब देते थे , ‘ सरकार जब मेहमान बना कर ले जाएगी तब . ‘ मेरे शैशव का पूरा काल , मुझे ऐसा जान पड़ता है , मानो वह हमारे बुजुर्गों की जेल - यात्रा और दो जेल - यात्राओं के बीच का काल हो . भारत की जनता के लिए भी अहिंसक आन्दोलनों का वह शैशव - काल ही था . यही वह काल था , जब पहले - पहल भारत के शिष्ट लोगों ने जेल को महल मान लिया . इसलिए आश्रम के बच्चों के लिए सरकार का मेहमान बनने की घटना नई बात नहीं थी . एक बार काका को लेने के लिए पुलिस की काली गाड़ी आयी , तब मैंने काका से कहा , ‘ आप यह थोड़े दिन की सजा भुगत कर क्यों आते हैं ? इस बार लम्बी सजा काट कर आना . ‘ और सचमुच उस बार उनको लम्बी सजा ही हुई . इसके बाद वे दिन याद आते हैं , जब जेल में काका से मिलने जाते थे . छोटी - सी चड्डी और छोटा - कुर्ता . इन दोनों पर नीली धारियाँ . वैसे काका को सब तरह की पोशाकें फबती थीं . लेकिन जेल की पोशाक में वे दुबले लगते थे . माँ के साथ घर की बातें होती थीं . मैं तो उनको उनकी जेल की दुनिया के सम्बन्ध में ही तरह - तरह के प्रश्न पूछता था . जेल की बैरक , जेल का भोजन , जेल का काम और जेल के साथी - इत्यादि की जानकारी मेरे लिए किसी अग्यात प्रदेश की कहानी बन जाती थी . राष्ट्रीय आन्दोलन में कारागृह - वास की घटना का एक अनोखा स्थान था . एक ओर जहाँ उसने प्रजा में से सरकार का भय एकदम समाप्त कर दिया , वहीं दूसरी ओर सच्चे सत्याग्रहियों के लिए कष्ट सहन करने का मौका उसने दिया . तीसरा लाभ यह हुआ कि अनेक सत्याग्रहियों के लिए जेल एक स्वाध्याय - प्रवचन का विद्यापीठ ही बन गया . काका को बेलगाँव जेल में ये तीनों लाभ प्राप्त हुए . हर जेल - यात्रा हमारे पारिवारिक जीवन को स्पर्श करती ही थी . लेकिन उस बार काका को जुर्माना हुआ . उसकी वसूली के सरकारी अफसर हमारे कुल के दीहण गाँव पहुँच गये . वहाँ मेरी दादी-माँ इच्छाबहन ने हिम्मतपूर्वक जुर्माना भरने से इन्कार कर दिया . इस कारण उसको अफसरों के अपमान भरे शब्द सुनने पड़े . इस घटना ने सिद्ध कर दिया कि सत्याग्रह के आन्दोलन ने ठेठ दूर - देहातों की जनता को भी निर्भय बना दिया था . बेलगाँव जेल में काका को काफी कष्ट उठाने पड़े . बड़ा कष्ट तो एकान्तवास का और अलग पड़ जाने का था . कई बार तो हम लोगों में से कोई भी उनसे मुलाकात के लिए नहीं पहुँच पाता था . पत्र - व्यवहार पर पाबंदी थी . क्योंकि वहाँ के जेलर या सुपरिण्टेण्डेण्ट गुजराती भाषा जानते नहीं थे . और मुझे या माँ को अंग्रेजी नहीं आती थी . कई महीने बाद काका से मिलने गये , तब देखा कि काका का चेहरा काफी बदल गया है . उनके गंजे सिर के रहे - सहे बाल सफेद होने लगे थे . चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ने लगी थीं . कुछ दाँत भी गिर गए थे . कुल मिलाकर बुढ़ापे के स्पष्ट लक्षण दिखाई देने लगे थे . काका को जेल में अन्य राजनीतिक कैदियों से अलग रखा गया था . क्रिमिनल ( अपराधी ) कैदी तो उनसे बात भी नहीं कर सकते थे . ( भाषा का ग्यान न होते हुए भी सिर्फ़ काम के निमित्त काका के प्रति अपना प्रेम व्यक्त करनेवाले एक कन्नड़ मुस्लिम कैदी की तारीफ़ हमारी कुछ क्षणों की मुलाकात में भी काका ने की थी . ) कारावास के इन्हीं दिनों में काका ने बापूजी की ‘अनासक्ति - योग’ पुस्तक का अंग्रेजी में अनुवाद किया और गीता पर अपना भी भाष्य लिखा . डायरी छोड़कर काका की यही पुस्तक शायद उनके सब ग्रन्थों में सर्वश्रेष्ठ कही जाएगी . कारागृह ने काका को एक ओर बुढ़ापा दिया , तो दूसरी ओर गीता भी दी . ( जारी )

रुचिकर संस्मरण है। जारी रखें …