हर्ष - शोक का ब‍ंटवारा : बापू की गोद में ( ४ )

[ जीवन के प्रारम्भिक सात - आठ वर्षों का असर मनुष्य के मानस पटल पर कृष्णपक्ष की रात्रि के समान होता है ...किसी एक चन्द्रमा की प्रभा नहीं होती , बल्कि लाखों छोटी - बड़ी तारिकाओं की आभा छायी रहती है .]

    जीवन के प्रारम्भिक काल के ( सात - आठ वर्ष के ) कितने प्रसंग मनुष्य को याद रहते होंगे ? मुश्किल से उंगलियों पर गिनने जितने . लेकिन इन्हीं सात - आठ वर्षों में जीवन के अधिकांश संस्कार उसके मानस - पटल पर अंकित होते हैं . इन वर्षों का असर कृष्णपक्ष की रात्रि के समान होता है . कृष्णपक्ष में किसी एक चन्द्रमा की प्रभा नहीं होती , बल्कि लाखों छोटी- बड़ी तारिकाओं की आभा छायी रहती है . वह रात देखकर हमारी आंखों में चन्द्र की चांदनी नहीं भर जाती , बल्कि इन सब तारिकाओं से आकाश में चित्रित एक रंगोली की आभा छा जाती है .

    मेरे जीवन के प्रारम्भ के सात - आठ सालों ( १९२४ से १९३२ ) की जो छाप मेरे मानस पर बनी है , वह भी इस कृष्णपक्ष के नभोमण्डल जैसी ही है . हां , इतना जरूर है उसमें कहीं - कहीं बापू जैसे चन्द्र - सूर्य की तेजस्विता है , तो कहीं - कहीं मेरे पिताजी या नरहरीभाई जैसे गुरु - शुक्र की अलग चमक भी है , लेकिन इन सबसे बढ़कर कहीं अधिक गहरी छाप उन अग्यात तारिकाओं और नीहारिकाओं से भरी आकाशगंगाओं की है , जो बापू के नभोमण्डल में सदा शोभायमान रहती थी . इसमें कोई एक तारा विशेष पात्र नहीं बना है , बल्कि अनगिनत तारिकाओं का मिला - जुला असर है . ऐसी एक - दूसरी में एकरूप हो जानेवाली उन रात्रियों की इस रंगोली को पृथक - पृथक पंक्तियों में रखने का मैं प्रयत्न करता हूं , तब उनमें से दो रंग विशेष रूप से प्रकट होते हैं . मानव की मन:सृष्टि के दो सनातन रंग : एक आनन्दोल्लास का और दूसरा गहरे विषाद का . बापूजी के आश्रम में जिन अनेक प्रसंगों का अनुभव मुझे हुआ , उनमें इन दोनों प्रकार की छाप है . बहुत दफ़ा तो हर्ष - विषाद की यह छाप एक - दूसरे में मिल गयी-सी लगती हैं . फिर भी सहूलियत की दृष्टि से यहां उनका अलग - अलग वर्णन करूंगा .

    हर्ष की छाप के प्रतीक आश्रम के उत्सव थे और विषाद की छाप के प्रतीक थे उन दिनों के मृत्यु - प्रसंग .

    शैशवावस्था अपने में ही जीवन के प्रत्येक क्षण में हर्ष का कुंकुम घोल देती है . फिर भी यहां तो बीसियों बालक की कुलबुलाहट से गूंजता घोंसला , कलकल करती हुई साबरमती नदी , जीवन का आनन्द लूटने और लुटानेवाले काकासाहब जैसे आचार्य , सत्याग्रह के शुष्क वातावरण में भी ‘ चित्रांगदा और विदाय अभिशाप ‘ को गुजराती में लानेवाले रसिक बुजुर्ग की गोद और पन्डित खरे के स्वर , जो स्वयं मानो भक्ति और संगीत के संयुक्त अवतार थे . फिर पूछना ही क्या !

    आश्रम के उत्सवों को याद करने बैठता हूँ तो सारा बाल्य - काल एक समूचा उत्सव बनकर आंखों के सामने खड़ा हो जाता है . उनमें भी मुख्यतया गोकुल - अष्टमी विशेष रूप से याद आती है , जब आश्रम के सारे लोग एक साथ मिलकर भगवद्गीता का सहपरायण करते थे . हमसे उम्र में पांच - सात साल बड़े लड़के - लड़कियां - रामभाऊ , मथुरी , कनु , इन्दु आदि मिलकर शंकराचार्य का गोविन्दपञ्चकम स्तोत्र एक स्वर में गाकर हमें मुग्ध करते थे . सिर पर लाल रंग की पगड़ी और घुटने तक की छोटी सफेद धोटी पहनकर खुले बदन हम बछड़ों को चराने हो लेते थे और वापस आते समय हमारे मुँह दही - मक्खन के बदले गौशाला के बने पेड़ों से भरे रहते थे .

    और स्मृतिपट पर गोकुल - अष्टमी के बगल ही में खड़ी है रामनवमी - तुलसी रामायण के स्वरों से गूँजती हुई . उसमें प्रमुख पात्र थे तोतारामजी , उत्तर - प्रदेश के अपने खेती - विकास को ठेठ फीजी द्वीप तक पहुँचाकर ये भाई आखिर साबरमती - आश्रम में आकर वहाँ की खेती देख रहे हैं . इनके साथ हमारा सम्बन्ध तभी आता था , जब प्रेमाबहन हमारा एक समय का भोजन बन्द करा देतीं . उस दिन इनकी ( यानी आश्रम की ) खेती में घुसकर हम टमाटर , गाजर , मूली तोड़कर खाते थे और कहीं चोर न कहलाये जाएँ , इसलिए उनके मकान की नाली मे मुँह डालकर ‘ तो……ता ‘ करके जोर से चिल्लाकर उनको सूचना देते दे देते थे . मानो चोरी नहीं की , बल्कि डाका डाला हो . कभी - कभी पकड़े जाते तो वे हमें कमरे में बन्द कर देते थे . कमर में भूल से रह गयी टमातर की डलिया कभी - कभी हाथ लग जाती तो उसको फ़ना कर देते थे . टमाटर खा लेने की खुशी हम समय से पहले ही प्रकट कर देते तो हमें वहाँ से हटाकर दूसरे खाली कमरे में बन्द कर दिया जाता था . और उससे अन्त में क्रन्दन के सहारे मुक्ति मिलती . लेकिन रामनवमी के दिन आश्रम के उस परममंगल विभूति की आध्यात्मिक खेती के फल हम बिना माँगे , बिना समझे , चखते थे , जिसकी मिठास उन गाजर - टमाटरों से बहुत गहरी और स्थायी थी , यह आज ध्यान में आता है . ऐसी ही एक रामनवमी के दिन ही तो सूत्र-यग्य ( हर उत्सव को बापू सूत के कोमल धागों से बाँधते ) करते हुए थोड़े क्षणों में विनोबा की आँखों से भक्तियुक्त आँसू टप- टप -टप टपकने लगे थे न !

    ( जारी )

 

1 Response to “हर्ष - शोक का ब‍ंटवारा : बापू की गोद में ( ४ )”


  1. 1 Anunad December 18, 2006 at 9:04 am

    गाँधीजी की सबसे बड़ी उपलब्धि यह थी कि उन्होने देश-विदेश के लगभग सभी त्यागी महान आत्माओं को भारत की स्वतन्त्रता की सिद्धि के लिये जोड़ सके थे।

    उनकी दूसरी बड़ी महानता यह थी कि उन्होने भारत की सम्पूर्ण आजादी का आन्दोलन चलाया था। उनका आन्दोलन एक साथ भारत की राजनीतिक, आर्थिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, नैतिक तथा बौद्धिक स्वतन्त्रता का अन्दोलन था।


www.blogvani.com