बापू की गोद में (२): प्रभात - किरणें

    कुछ समय के लिए बापू ने साबरमती के सत्याग्रह आश्रम का नाम बदलकर ‘ उद्योग - मन्दिर ‘ रखा था . ‘ सत्याग्रह - आश्रम ‘ नाम शायद भारी मालूम हुआ हो . ‘ उद्योग मन्दिर ‘ नाम उससे कम महत्वाकांक्षावाला और अधिक वास्तववादी कहा जाएगा . फिर भी संस्कृत भाषा और बापू की पसन्दगी , दोनों में यह खूबी थी कि ‘ आश्रम ‘ शब्द में ‘ श्रम ‘ शब्द था और ( मन्दिर को छोड़ दें तो भी ) ‘ उद्योग ‘ में योग शब्द था ही .

    आश्रम के एक स्थान का मूल नाम कायम रहा था - प्रार्थना - भूमि . आज जिसको उपासना - भूमि कहा जाता है , उस स्थान को सत्याग्रह - आश्रम से छोटी संग्य़ा बापू दे नहीं सके .

    कैसे दे सकते थे ? सत्याग्रह के विचार का जन्म ही प्रार्थना की भूमिका में से हुआ था . उस स्थान पर बापू का सत्याग्रही जीवन सोलह कलाओं से प्रकट होता था . प्रार्थना में जब केवल आश्रमवासे रहते , तब उनके एक - एक प्रश्नों को ले कर सत्याग्रही के नाते उनका व्यवहार कैसा होना चाहिए , इस सम्बन्ध में बापू मार्गदर्शन करते थे . उनके विचार में सत्याग्रह महज अंग्रेजों के खिलाफ़ लड़ने का शस्त्र नहीं था . सत्याग्रह तो सत्य की खोज करनेवाले की सपूर्ण जीवन - पद्धति थी . इसीलिए जीवन के हर पहलू की परीक्षा प्रार्थना - भूमि में सत्याग्रह की कसौटी पर की जाती थी . उठने में देर क्यों हो जाती है ? प्रार्थना में झपकी क्यों लग जाती है ? स्वप्नदोष क कारण क्या है ? क्या क्रोध दु:साध्य रोग है ? क्या आश्रमवासियोंको जेवरों की आवश्यकता है ? आहार का परिणाम मन पर कितना कितना होता है ? इत्यादि कई व्यक्तिगत प्रश्नों की छानबीन बापू प्रार्थना के बाद करते थे .  इसी भूमि पर से बापू ने गीता पर प्रवचन भी किए थे . और दाण्डीकूच के समय लोगोंकी भारी भीड़ के कारण उपासना - भूमि की जगह छोटी पड़ी , तो साबरमती नदी के विशाल रेतीले तट का उपयोग करना पड़ा . पण्डित खरे की सागर - गम्भीर संगीत - ध्वनि , जो जड़ को भी दोलायमान करनेवाली थी , उस समय की मेदिनी के सामने अपर्याप्त साबित हुई .

    स्थल भी कितना रमणीय था ! एक ओर हृदयकुंज , दूसरी ओर दत्त - मन्दिर , तीसरी ओर वह नदी ,जो गरमी के मौसम में अन्त:स्रोता फलगू की तरह रुक्ष रेतेली , तो बारिश में तूफ़ानी बाढ़ से घों - घों करनेवाली , लेकिन बारहों मास उपासना - भूमि का पद - प्रक्षालन करते हुए अखण्ड बहती हुई साबरमती नदी !

    लेकिन इस प्रार्थना - भूमि के साथ मेरे बचपन के संस्मरण ( ४ से ७ वर्ष की उम्र तक के ) जाड़े के दिनों में उस भूमि पर क्रीड़ा करते हुए चकवे , मैना और मोरों की तरह ही खिलवाड़वाले हैं .

    बापू उत्तर की ओर के पेड़ के नीचे बैठते थे . बापू की एक ओर  बहनें और दूसरी ओर भाई बैठते थे . मैं प्रार्थना में जाने लगा , तब से ही मैंने अपना स्थान खोज लिया था . बहनों या भाइयों की पांत में बैठने के बदले मैंने बापू की गोद में बैठना शुरु किया . उस तथ्य के बारे में आज सोचता हूं तो लगता है कि वह कितना बड़ा भाग्य था और साथ ही कितनी जिम्मेदारियों से भरा था . लेकिन उस समय वहां जाकर बैठने का कारण शायद यही था कि सारी प्रार्थना का , आश्रम का और हमारी सारी दुनिया का केन्द्रस्थान बापू की गोद थी .

    कुछ दिनों बाद मेरा एक प्रतिस्पर्धी खडा हुआ . भाई प्रबोध चौकसी आश्रम में अपने नाना के पास कुछ दिन रहने आया . तब वह भी बापू की गोद में बैठने लगा . तब तक आश्रम में सब बच्चों में छोटा मैं ही था . लेकिन प्रबोध मुझसे भी छोटा था . इसलिए उसका हक नामंजूर हो ही नहीं सकता था . हम दोनों को अगल - बगल बैठाकर बापू ने समस्या का हल निकाल लिया .

    लेकिन कुछ दिनों बाद बढ़ती हुई और हमें सबके साथ प्रार्थना में ठीक ढंग से बैठने को कहा गया . हम बच्चे दोनों तरफ़ का लाभ उठाते . कभी भाइयों की कतार में बैठते तो किसी व्यक्ति-विशेष को चुनकर उनकी नकल करने में अपनी सारी सारी एकाग्रता का उपयोग करते थे . जब बहनों की कतार में बैठते तो भगवान के साथ तद्रूप बनने की इच्छा रखनेवाली साथ - साथ बैठी दो बहनों की चोटियां धीरे से जोड़ देने में हम सार्थकता का अनुभव करते थे .

    क्या आश्रम में एक भी बात ऐसी होती होगी , जो बापू के पास न पहुंचे ? ‘ बापू, आज खजूर का आधा फल अधिक खाया गया’, ‘गरम पानी से नहाना अच्छा या ठंडे पानी से?’ इत्यादि अनेक बातों का निर्णय बापू के द्वारा होता था . फिर हमारा यह नटखटपन तो शिकायत करने लायक था . उसको बापू के पास पहुंचने में देर ही क्या थी ? ‘ बापू यह बाबला ,धीरू और धर्मकुमार प्रार्थना के समय हमें सताते हैं . ‘

    हम मन में सोचते कि अब अदालत बैठेगी और वकील , गवाहों की जरूरत पड़ेगी . असहयोगियों की तरह हम अपना गुनाह सीधे - सीधे स्वीकार कर लें तो कैसा रहेगा ?

    लेकिन हमें अधिक देर इस सम्बन्ध में माथापच्ची नहीं करनी पड़ी . हमसे जवाबतलब न करते हुए बापू ने कह दिया कि ‘ अपनी प्रार्थना में इन बच्चों को क्या रस आता होगा ? उनके लिए अलग प्रार्थना की व्यवस्था करो . ‘

    मन में था वही मानो बैद ने बता दिया . लेकिन सच कहूं ? हमारी प्रार्थना में और क्या होता था यह तो आज याद नहीं है , लेकिन इतना जरूर याद है कि प्रार्थना के अन्त में रामायण की कथा सुनाई जाती थी . इसमें भी किष्किन्धा-काण्ड और लंका-काण्ड को छोड़ और कुछ भी याद नहीं है ,यह भगवान की कसम खा कर कह सकता हूं . रात को हम प्रार्थना में जो भी सुनते थे या बोलते थे ,उसकी छाप हमारे दैनन्दिन जीवन पर बड़ों की अपेक्षा अधिक जल्दी और गहरी पड़ती थी . मेरी मां पर उस समय आश्रम के कोठार ( भण्डार ) की किम्मेवारी थी . इससे पहले जिन भाइयों ने कोठार संभाला था, उनकी हर रोज हिसाब में कुछ-न-कुछ भूल रह जाती थी. लेकिन जब से बहनों ने काम संभाला,हिसाब बिलकुल ठीक मिल जाता था, इसकी मेरी मां को साभिमान खुशी थी .इसमें काम बहुत करना पड़ता था . एक दिन मां थकी-मांदी बड़ी देर से कोठार से आ रही थी कि आनन्द-निवास के फाटक के पास उसने बाबला को अलकतरा से हाथ-मुंह काला किये बड़े ठाठ के साथ बैठे देखा .

    ‘ हाय राम , यह तूने क्या किया ?’ मां ने अकुलाकर कहा .

    छोटे-छोटे चीथड़ों को एक - दूसरे से बांधकर लंकापति रावण के सिंहासन जितनी लंबी बनायी हुई लंगोटी की ओर इशारा करते हुए मैंने कहा , ‘ मारुति बना हूं,मारुति’ .

    यों तो बापू को हमारा यह नटखटपन अच्छा लगता था, बल्कि कभी मौका पा कर बापू हमारे साथ  खेल भी लेते थे .  लेकिन कभी - कभी वे हम पर दूसरी शिक्षा - पद्धति का भी प्रयोग करते थे और उसमें सफल भी होते थे . जो कोई सुबह देर से उठता था,उसको उठने की घण्टी बजाने का काम सौंपना यह बापू का इलाज सबको मालूम हो गया था .इसी तरह हमें कुछ-न-कुछ जिम्मेवारी का काम सौंपकर हमारे उत्साह और उधम को लगाम लगाने का काम बापू करते थे . ( जारी )

2 Responses to “बापू की गोद में (२): प्रभात - किरणें”


  1. 1 प्रियंकर December 15, 2006 at 10:57 am

    अफ़लातून जी,
    आपके लिखे संस्मरण बहुत डूब कर पढ रहा हूं . कृपया लिखते रहें . इससे गांधी की व्यक्तिगत जीवनचर्या के माध्यम से भारतीय इतिहास के कुछ अंतरंग पृष्ठ उड़ते हुए हमारे सामने आ जाते हैं . उस महान व्यक्ति के प्रेरक जीवन से यदि हम प्रकाश के कुछ कण भी चुन पाए तो सौभाग्यशाली होंगे .
    नये साल की पेशगी मुबारकबाद के साथ,
    आपका
    प्रियंकर

  2. 2 afloo December 15, 2006 at 11:11 am

    प्रियंकर भाई,
    यह संस्मरण श्री नारायण देसाई के शैशव के हैं.पुस्तक के रूप में कई भाषाओं में छप चुके हैं.मैं सिर्फ संजाल पर उन्हे असम्पादित पेश कर रहा हूं.
    मेरे दूसरे चिट्ठों को भी आप जैसे पाठकों की आस रहती है.
    नया साल मुबारक़ हो .


www.blogvani.com