December 9, 2006...2:26 pm

नल की हडताल

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आज सुबह से नल था मौन्,
पता नहीं कारण था कौन ?
मैंने पूछा तनिक पास से ,
भैय्या दिखते क्यों उदास से ?
बोला , ‘क्या बतलाऊं यार ,
रोज सहन सहन करता हूं मार .
कान ऐंठता जो भी आता ,
टांग बाल्टी मुझे सताता .
लडते मेरे पास खडे हो ,
बच्चे हों या मर्द बडे हों .
नहीं किसी को दूंगा पानी !
इसीलिए हडताल मनानी !

पास रखी तब बोली गागर ,
‘ हम हैं रीते,तुम हो सागर ,
जल्दी प्यास बुझाओ मेरी ,
सोच रहे क्या ? कैसी देरी ?

नल को दया घडे पर आई,
पानी की झट धार बहाई ..
(कवि- अज्ञात,किसी को पता हो तो जरूर बताए.)

1 Comment

  • कविता कभी पढ़ी तो नहीं, पर बच्चों की कविता जब भी पढ़ते हैं मानो बचपन आँखोंके सामने सजीव हो जाता है।
    बहुत अच्छी कविता/ कवितायें है।


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