February 5, 2010

आज क्या है ?

माघ पूर्णिमा के दिन सन्त रविदास की जयन्ती मनाई जाती है । किसी अन्य कवि के लिए उसके जन्म स्थान में, जनम दिन पर इतनी बड़ी और शानदार शोभा यात्रा निकलती हो इसकी जानकारी मुझे नहीं है ।

बहरहाल , उस दिन लोगों के दिलों में सन्त कवि की जन्म तिथि को जमाने के लिए जुलूस में शामिल लोग एक नारा भी लगाते हैं -आज क्या है ? – माघी पूर्णिमा है । आज क्या है ?- रविदास जयन्ती है ।

वैसे हीआज मैं पूछना चाह रहा हूँ- आज क्या है ?

ई-पत्राचार में हमें आज की तारीख टाइप नहीं करनी पड़ती इसलिए मेरे द्वारा पूछे गये सवाल के खूबसूरत उत्तर का उत्तर लोगों के ध्यान में जल्दी नहीं आयेगा ।

आज 5 / 2 / 10  है । इस साल 2 / 5 / 10 भी आयेगी ।

एक आत्मीय ने अपने नाम के साथ इस ओर ध्यान खींचा हुआ है ।

January 31, 2010

एक नयी खेल नीति : अशोक सेक्सरिया

हमारे-जैसे गरीब देश में खेलों का स्वरूप यह होना चाहिए कि उनमें प्रतियोगिता का तत्त्व कम-से-कम रहें, संगीत और नृत्य के तत्त्व अधिक रहें , कम-से-कम उपकरण हों और ऐसी सहजता हो कि अधिकाधिक लोग खेलने की ओर प्रवृत्त हों । इस बारे में गंभीरता से सोचना आवश्यक है । १९३० के दशक में बंगाल में पश्चिमी खेलों के विकल्प के रूप में एक आन्दोलन , व्रतचारी आंदोलन उभरा था । यह संगीत , नृत्य और लोकखेलों के आधार पर व्यायाम व खेलों की रचना करने का आन्दोलन था । देश की गुलामी के कारण इसमें राष्ट्रीयता का भाव प्रबल था पर यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसा बच्चों और युवकों को कुन्दजेहन करनेवाला और उनमें साम्प्रदायिक विद्वेष भरनेवाला आंदोलन न था । गांधीजी और रवीन्द्रनाथ ने इसे प्रोत्साहित किया था । बंगाल में आजादी के पहले तक व्रतचारी आंदोलन काफ़ी फैला , कितने ही स्कूलों में व्रतचारी खेल शुरु हुए ; पर आजादी के बाद वह सूखता चला गया ।

हमारे देश में खेलों को पश्चिमी देशों की नकल में संगठित रूप देने की कोशिश करना उपभोक्तावादी संस्कृति को ही पनपाएगा । सरकार को इस बात की ओर ध्यान देना चाहिए कि लोगों को खाना-पीना मिले , उनका स्वास्थ्य उन्नत हो , बच्चों को खेलने के लिए खुली जगहें उपलब्ध हों । लोग या बच्चे क्या खेलें यह सरकार  तय न करे । कंपनियों के खेल-जगत में प्रवेश पर प्रतिबन्ध लगाया जाए ।

हमारी दुनिया में बहुत-से ऐसे खेल हैं जिनमें प्रतियोगिता का तत्व नहीं होता और वे प्रेम व मैत्री को बढ़ाते हैं । ऐसे खेल विलीन होते जा रहे हैं और इनके बारे में हमे ज्यादा पता भी नहीं है । मसलन पश्चिमी सुमात्रा के देशज खेलों में विजय एक बुरी चीज मानी जाती है , उनमें प्रतिस्पर्धा का कोई तत्व ही नहीं होता । एक पश्चिमी लेखक ने लिखा है : सुमात्रा के लोगों का खेल संबंधी दृष्टिकोण सबको पराजित करने वाले और और अपने को श्रेष्ठ साबित करने वाले पश्चिमी दृष्टिकोण से एकदम उलटा है । लेकिन सुमात्रा में आज ऐसे खेलों का खात्मा हो रहा है और कराटे व अन्य फैशनेबल सामरिक खेलों का उदय हो रहा है । सुकर्ण-शासन के ओलंपिक में भाग लेने के निर्णय से यह स्थिति और भी बिगड़ गयी । ओलिम्पिक-खेलों का तीसरी दुनिया के मुल्कों पर नुकसानदेह असर हुआ है । सुमात्रा-जैसे देश अब ओलिम्पिक खेलों में पदक न जीत पाने के कारण हीन-भाव से ग्रस्त हो गये हैं ।

यह बेतरतीब लेख समाप्त करते हुए यह लिखना आवश्यक लगता है कि अब शासक-वर्ग की वासना १९९२ में ओलिम्पिक खेलों का आयोजन करने की होगी । एशियाई खेलों के स्टेडियमों का निर्माण ऐसी निष्ठुर उर्जा के कारण हुआ जिसके प्रयोग की शर्त ही देश के गरीबों की उपेक्षा थी । भारत जैसे टेक्नोलोजी में पिछड़े देश में इतने कम समय में स्टेडियमों का निर्माण श्रम-कानूनों का उल्लंघन कर दो लाख मजदूरों को दिन-रात खटाकर ही संभव हो पाया – ये स्टेडियम एक प्रकार के दास-श्रम की मीनारें हैं । १९९२ में यदि हमारे यहाँ ओलिम्पिक हुए तो हिटलर और स्टालिन के यातना-और-श्रम-शिबिरों-जैसी परिस्थितियों में ही निर्माण कार्य होगा ।

स्रोत : सामयिक वार्ता , नवम्बर , १९८२

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क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ?

हिटलर और खेल

खेल और व्यापार

सरकार और खेल

साम्यवादी रूस और खेल

January 25, 2010

साम्यवादी रूस और खेल : अशोक सेक्सरिया

अन्तरराष्ट्रीय खेलकूद में कम्युनिस्ट देशों की अभूतपूर्व सफलता , हमारी सरकार को उनकी भी नकल करने को प्रोत्साहित करती है ( जैसे पटियाला , बंग्लोर , ग्वालियर , राई , पूना के राष्ट्रीय खेल संस्थान जो रूस के राष्ट्रीय खेल स्कूलों के ही भारतीय खेल संस्करण हैं ) लेकिन उनके जैसा खेल-संगठन करने की न इच्छा-शक्ति है और न क्षमता , इसलिए खेलों का सारा ढाँचा इंग्लैण्ड और अमरीका की ही नकल में खड़ा हो रहा है । रूस में क्रान्ति के बाद बहस चली थी कि खेल कैसे हों । एक मत यह था कि प्रतियोगिताएं पूंजीवादी समाज की देन हैं , समाजवादी समाज में उनकी उपयोगिता नहीं ; जन-स्वास्थ्य उन्नत करने पर ध्यान देना है , प्रतियोगिताओं पर नहीं । यह मत पूरी तरह तो माना नहीं गया पर १९२८ तक प्रतियोगिताओं की जगह फ़िज़िकल कल्चर ( व्यायाम , स्वास्थ्य-उन्नति के कार्यक्रम ) पर ही जोर रहा। लेकिन स्टालिन द्वारा विरोधियों के सफ़ाये के साथ और पंचवर्षीय योजनाओं के साथ द्रुत औद्योगीकरण व आधुनिकीकरण के चलते प्रतियोगिताओं पर जोर बढ़ता गया । १९४९ में पारटी ने घोषणा की ” खेल-कूद में दक्षता को बढ़ाना है ताकि विश्व – प्रतियोगिताओं में सफलता मिले । ” १९५२ में रूस ने पहली बार ओलम्पिक में भाग लिया । तबसे कम्युनिस्ट देशों ( खासकर रूस और पूर्वी जरमनी ) ने अपनी केन्द्रीकृत व्यवस्था का उपयोग कर अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में असाधारण सफलता प्राप्त की । लेकिन यह भी कहना होगा कि उन्होंने अपने यहाँ बहुत बड़ी आबादी को खेल के अवसर भी प्रदान किए ।

यहां रूस की चरचा का उद्देश्य यह है कि इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति के साथ पबलिक स्कूलों के उदय के कारण १९वीं सदी में खेल-कूद का जो नक्शा बना और जो यूरोप और ब्रिटिश साम्राज्य में चल पड़ा , उसको जो चुनौती मिल सकती थी , वह रूस के भी प्रतियोगिता तत्व अपना लेने के कारण नहीं मिली । इससे पिछले ५०-६० सालों से खेलों में खेल के जो मूल तत्व (उमंग और सहजता) खत्म होता गया है और वे ज्यादा-से-ज्यादा संगठित किए जा रहे हैं जिससे वे किसी-न-किसी निश्चित प्रणाली के तहत होते हैं और राष्ट्र की इज्जत के सवाल और उन्माद के जनक बन जाते हैं । जब खेलों में जीतना सर्वोपरि हो जाता है , तकनीकों का विज्ञानसम्मत विकास किया जाना लगता है और दर्शकों पर अत्यधिक ध्यान दिया जाता है , तब वे खेल नहीं रह जाते , दक्ष प्रदर्शन हो जाते हैं । हमारे यहां यही हो रहा है ।

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क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ?

हिटलर और खेल

खेल और व्यापार

सरकार और खेल

January 23, 2010

सरकार और खेल : अशोक सेक्सरिया

१९८२ के एशियाई खेल , १९५२ में साढ़े छ: लाख रु. की लागत से आयोजित प्रथम एशियाई खेलों की ही परिणति हैं । प्रथम एशियाई खेलों द्वारा अंगरेजों के राज में खेलों का जो ढाँचा बना था उसे ज्यों-का-त्यों स्वीकार कर लिया गया । खेलों के बारे में आजाद देश में कोई नीति नहीं बनाई गई । नतीजा यह हुआ कि हमारे देश में खेल कैसे हों  , यह कभी बहस का मुद्दा ही नहीं बना । एक ही लक्ष्य बनता गया कि अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में किसी भी प्रकार से ज्यादा-से-ज्यादा सफलता प्राप्त की जाये (खेलों में भारत की हार होने पर संसद में हमेशा हल्ला हुआ है ) । इस कारण देशवासियों की जरूरत के रूप में खेलों की कल्पना नहीं हुई है और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगितायें जीतने के लिए खेलों को ज्यादा-से-ज्यादा संगठित रूप देने , प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाने और सफ़ल राष्ट्रों की तकनीकी की नकल करने की अधकचरी कोशिशें चालू हुईं । देहाती खेल-कूद प्रतियोगिता शुरु की गई तो उद्देश्य देहातों से विश्व विजेता प्राप्त करना था , देहात के लोगों के लिए ख्ले के अवसर जुटाना नहीं । जैसे यह मान लिया जाता है कि गरीबों को रोटी से मतलब है , लोकतंत्र से नहीं , वैसे ही मान लिया गया कि गरीबों को खेल की कोई जरूरत नहीं है। ऐसे में खेलों का सारा तामझाम ( विकास कत्तई नहीं कहेंगे ) , विशिष्ट वर्ग की अन्तरराष्ट्रीय सफलता प्राप्त करने की वासना मिटाने और बढ़ती आबादी को बम्बइया फिल्मों जैसा एक और घटिया उत्तेजना भरा मनोरंजन प्रदान करने के लिए खड़ा होता गया । इसी का नतीजा यह है कि खेलों में औद्योगिक घरानों का प्रवेश हो रहा है , उनकी टीमें बन रही हैं , उनके सौजन्य से प्रतियोगितायें हो रही हैं और गावस्कर-जैसे पेशेवर लखपति खिलाड़ियों का उदय हो रहा है ।

सरकार कम्युनिस्ट देशों की तरह खेलों का संगठन करने में असमर्थता और अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता हासिल करने की वासना के चलते ( यह शासक वर्गों की सम्रुद्ध राष्ट्रों के सम्पन्न लोगों – जैसा रहन – सहन प्राप्त करने की वासना का दूसरा रूप है) पिछले ७-८ वर्षों से खेलों के बारे में उपभोक्तावादी मनोवृत्ति को बढ़ा रही है । इसके पीछे शहरी आबादी को बहलाकर समस्याओं से बेखबर करने की साजिश  के साथ यह ’ महान विचार ’ भी काम कर रहा है कि खेलों के प्रति उन्माद बढ़ाने से ( रात के तीन बजे तक विश्वकप फुटबाल के मैच टेलिविजन पर दिखाये जाते हैं ) देश में विश्व विजेता खिलाड़ी पैदा हो सकेंगे ।

जारी : अगली किश्त : साम्यवादी रूस और खेल

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क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ?

हिटलर और खेल

खेल और व्यापार ,

January 21, 2010

खेल और व्यापार : अशोक सेक्सरिया

प्राय: सभी देशों में सरकार , उद्योग , जनसंचार के माध्यम ( मीडिया ) और सेना ने प्रतियोगात्मक खेलों के प्रति जनमानस में जबरदस्त आकर्षण पैदा करने की कोशिश की है । अगर हम एशियाई खेलों के आयोजन के सिलसिले में इन चारों की भूमिका के बारे में सोचने की कोशिश करें तो साफ़ नज़र आयेगा कि ये चारों मिलकर एशियाई खेलों का उन्माद पैदा कर रहे हैं । यह एक मिलीभगत है । सरकार की भूमिका तो इतनी स्पष्ट है कि उसकी चर्चा ही व्यर्थ है । उद्योगों यानी कम्पनियों को इन खेलों के माध्यम से अपना धुंआधार विज्ञापन करने और अनुपयोगी और विलासितापूर्ण वस्तुओं का बाजार तैयार करने का एक बहुत बड़ा  अवसर दिया जा रहा है । ( यह एक भयानक चीज है इससे सरकार और उद्योगपतियों का गठबंधन इस तरह मजबूत हो रहा है कि इससे उद्योगपतियों की मुनाफ़ाखोरी इस तरह बढ़ेगी जिससे आवश्यक वस्तुओं की कीमतों का बढ़ना और अनावश्यक वस्तुओं का निर्माण बढ़ना अनिवार्य है )। खेलों के तावीज (मस्कॉट,शुभंकर ) का व्यापार हम देख रहे हैं । अप्पू के छापे की कमीज का कपड़ा और गंजियां दूर दूर तक पहुंच रहे हैं। बड़े शहरों में अभी ही घरेलू नौकरों के बदन पर , मालिकों के साहबजादों के बदन से उतरी हुई अप्पू छाप की गंजी दिखाई देने लगी है । पनवाड़ियों और बस्तियों के शोहदों के बदन पर भी यह दिखती है । इसे शायद इन्दिरा गांधी एशियाई खेलों में गरीब की हिस्सेदारी मानेंगी ।

कम्पनियों की विज्ञापनबाजी का आलम तो यह है कि ऐसा लगता है कि हमने अमरीका जैसा स्तर प्राप्त कर लिया है । धनी देशों में खेल प्रतियोगितायें आजकल ज्यादातर बड़ी कम्पनियों के सौजन्य से होती हैं , जो इन्हें विज्ञापन का माध्यम बनाती हैं । इंगलैंड में पिछले साल सिगरेट कंपनियों के सौजन्य से खेल प्रतियोगिता का प्रबल विरोध करते हुए दस प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्रियों ने जिनमें आठ रायल मेडिकल कालेज के अध्यक्ष थे , खेल मंत्री को पत्र लिखा था । इस पत्र पर टिप्पणी करते हुए ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ने लिखा : ’  अगर सरकार प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्रियों की मांग (कंपनियों पर प्रतिबन्ध) स्वीकार नहीं करती तो , इसके दो ही अर्थ होंगे – या तो सिगरेट पीने से स्वास्थ्य बिगड़ने की बात गलत है या सरकार ने जनस्वास्थ्य के प्रति अपनी जिम्मेवारी को तिलांजलि दे दी है ” जब बीसवीं सदी के चिकित्साशास्त्र का इतिहास लिखा जायेगा तो ऐसी अनुमति देने वाली ( सिगरेट कंपनियों द्वारा प्रतियोगिता आयोजित करने की अनुमति) सरकार के सदस्य लोगों की बीमारी बढ़ाने के अपराध में कटघरे में खड़े किए जायेंगे । ” हमारे देश में सिगरेट कंपनियां सिर्फ़ खेलों का ही नहीं , नृत्य-संगीत के कार्यक्रम यहां तक कि चित्र प्रदर्शनियों का आयोजन कर रही हैं । हमारे देश में चाकलेट खिलाकर बच्चों के दांत नष्त करने वाली कैडबरी कंपनी को बच्चों की खेल-कूद प्रतियोगिताओं का आयोजन करने की अनुमति मिली हुई है । कहने का मतलब यह है कि एशियाई खेलों से इस प्रवृत्ति को भयानक रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है । उद्योगपतियों से सरकार का यह गठबंधन घोषणा करता है कि सरकार कैम्पा-कोला पिलाना कर्तव्य मानती है , जल पिलाना नहीं ।

जनसंचार के माध्यमों रेडियो, टेलिविजन ,अखबारों – द्वारा जो शोर मचाया जा रहा है उससे तो यही लगता है कि उनका काम  सिरफ़ सरकार और उद्योगपतियों के लिए जन मानस में एशियाई खेलों के प्रति उन्माद को बढ़ाना है । वे बार-बार यही दुहरा रहे हैं कि एशियाई खेलों के स्टेडियम विश्व कोटि के हैं और जिन चीजों में विश्व कोटि हासिल नहीं की जा सकी है उनका आयात कर लिया गया है । यह किस कीमत पर हुआ है , स्टेडियम आदि बनाने में किस प्रकार तमाम श्रम-कानूनों का उल्लंघन हुआ है और निर्माणस्थलों पर मजदूरों का कितना भयंकर शोषण हुआ है , इस बारे में इक्के-दुक्के लेख छपे हैं ( रेडियो,टेलिविजन के अनुसार तो भारत में शोषण नाम की किसी चीज का अस्तित्व ही नहीं है ) और वे कुछ वैसे ही हैं जैसे किसी आधुनिका को लिपस्टिक-पाउडर खरीदने के बाद गाड़ी में बैठते – बैठते एकाएक याद आ जाए कि उसे जीरा भी खरीदना था और वह ड्राईवर को जीरा लाने भेज  दे ।

टेलीविजन में एशियाई खेलों को लेकर जो कार्यक्रम आते हैं उनमें एक डी मेलो साहब खिलाड़ियों , आयोजनकर्ताओं और विदेशी विशेषज्ञों से पूछते हैं कि जिन सुविधाओं की व्यवस्था की गै है वे विश्वस्तर हैं न ! और, उन्हें हर बार जवाब मिलता है कि सब विश्वकोटि का है । इस विश्वकोटि का एक ही मतलब है कि हमारा शासकवर्ग देशवासियों को दु:ख-दैन्य के महासमुद्र में डुबाकर अपने लिये विश्वकोटि का रहन -सहन ही नहीं विश्वकोटि का मनोरंजन भी भी चाहता है ।

एशियाई खेलों में सेना की महत्वपूर्ण भूमिका है । उसके सहयोग के बिना सरकार इतने बड़े आयोजन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी । लेकिन ज्यादा महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ओलंपिक खेल और एशियाई खेल जैसे आयोजनों की मूलप्रकृति ( उग्र राष्ट्रीयतावाद , हार-जीत,सैनिक किस्म की रस्में , शक्ति-प्रदर्शन आदि ) सैनिक होती हैं और वे जनमानस में सैन्यशक्ति के प्रति सम्मान और आकर्षण पैदा करते हैं । तथाकथित कम्युनिस्ट देशों में तो सेना के लिए योग्य जवान प्राप्त करना खेल-कूद की नीति का एक बड़ा उद्देश्य होता है । हमारे देश में एशियाई खेलों के आमन्त्रण के आयोजन से खेल-कूद के क्षेत्र में सेना की भूमिका और बढ़ेगी । अ.भा. खेल कूद के अध्यक्ष के रूप में रिटायर सेनाध्यक्षों – जनरल करियप्पा , कुमारमंगलम , साम मानेकशा – को बैठाने की परम्परा तो बन ही चुकी है ।

सरकारीकरण , व्यापारीकरण , सैन्यीकरण और प्रोपैगैंडा का वास्तविक खेलों से कोई वास्ता नहीं होता और न होना चाहिए , लेकिन एशियाई खेलों का इनके सिवाय किसी अन्य चीज से वास्ता है ही नहीं । उल्लास , उमंग और सहजता से इनका कोई रिश्ता नहीं ।

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आरंभ में प्रश्न उठाया गया था कि – एशियाई खेल क्या वास्तव में खेल हैं ? हमने देखा उनमें खेल का मूल तत्त्व ही नहीं है । लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हो जाती , वह एक और प्रश्न खड़ा कर जाती है – हमारे देश में खेल कैसे हों ?

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हिटलर और खेल ]

January 18, 2010

हिटलर और खेल : अशोक सेक्सरिया

पिछले भाग से आगे :

१९ नवम्बर से एशियाई खेलों के नाम पर जो अश्लीलता होने जा रही है , उसमें कहीं भी वह खेल नहीं होगा जिसकी हमने ऊपर चर्चा की । इनमें तमगे बटेंगे , राष्ट्रगानों की धुनें बजेंगी और हारने का मातम व जीतने की बेहयाई होगी।  ऐसे में एशियाई खेलों को हम खेल क्यों मानें ? १९३६ में हिटलर ने बरलिन में ओलम्पिक खेलों का जो आयोजन करना चाहा था , वही कमोबेश इनमें किया जा रहा है । ओलिम्पिक के आयोजन में नाजियों ने पैसे की कोई परवाह नहीं की । न्यूरमबर्ग रैलियों के लगातार आयोजन से उन्होंने जो अनुभव प्राप्त किया था , उसे बहुत कारगर ढंग से ओलिम्पिक खेलों के आयोजन में लगाया | नाजियों की दृष्टि में ओलिम्पिक के आयोजन में खरच किया गया एक भी पैसा बेकार नहीं गया क्योंकि इससे उन्होंने दुनिया-भर में अपना जो धुंआधार प्रचार किया , वे किसी अन्य तरीके से नहीं कर सकते थे । नाजियों के यहूदी विद्वेष के कारण बरलिन में ओलिम्पिक करने के बारे में जो आपत्ति थी , उसे दूर करने के लिए हिटलर ने यह भ्रम भी फैलाया कि जरमनी की टीम में यहूदी लिये जायेंगे । ओलिम्पिक खेलों के आयोजन के पीछे हिटलर का उद्देश्य देशों के बीच प्रेम और मैत्री बढ़ाना नहीं था । उसका उद्देश्य विशुद्ध रूप से राजनीतिक था । अन्तरराष्ट्रीय खेलों का आयोजन होता ही है सरकारों की छवि निखारने के लिए । एशियाई खेलों का भी उद्देश्य यही है । दुनिया की ऋणदात्री संस्थाओं को भी दिखाना है कि भारत ऐसा देश है जिसे ऋण दिया जा सकता है ।

जहाँ तक अन्तर्राष्ट्रीय खेलों से भाईचारा और मैत्री बढ़ाने की बात है , वह एक झूठी किंवदन्ती है । थोड़े ही दिनों में भारत क्रिकेट मैच होंगे , देखिएगा हम हिन्दुस्तानियों में पाकिस्तान के प्रति कैसा प्रेम उमड़ता है ! प्रेम बढ़ता है एक देश के कलाकारों , लेखकों के दूसरे देश जाने से और यहाँ के कलाकारों लेखकों के साथ आदान – प्रदान करने से , क्योंकि कलाकारों और लेखकों के बीच मैच नहीं होते । पिछली बार पाकिस्तानी टीम हमारे यहाँ आई थी तो हमने उसको हरा कर भेजा , इस बार हम जायेंगे तो वे हमे हराकर भेजेंगे । अन्तरराष्ट्रीय खेलों का सभ्य रिवाज यह है कि मेजबान राष्ट्र मेहमान राष्ट्र को चोरी , बदमाशी और समर्थकों के जोर से हराकर विदा करता है । एशियाई – खेलों में भारतीय फुटबाल टीम को यही आशा है कि दर्शकों के जोर के दम पर वह शायद एकदम फिसड्डी साबित न हो ( यह प्रशिक्षक का मत है ) । समाजवादी लेखक जार्ज आरवेल ने अन्तरराष्ट्रीय खेलों के चरित्र के बारे में लिखा था :

” अगर कोई ठोस उदाहरणों से , जैसे १९३६ के ओलिम्पिक भी इस बात को न जान पाए कि अन्तरराष्ट्रीय प्रतियोगितायें अन्तरराष्ट्रीय घृणा (के अतिरेक व उन्माद ) को जन्म देती हैं तो वह मोटी – मोटी बातों से ही इस निष्कर्ष पर पहुंच सकता है कि – महत्वपूर्ण खेलकूद (सिरियस स्पोर्ट्स) का समानता और न्याय की भावनाओं से कोई वास्ता नहीं है । ये तो घृणा , ईर्ष्या , घमंड , नियमों की अवज्ञा करने और हिंसा को देखकर परपीड़क आनन्द प्राप्त करने से अभिन्न रूप से जुड़ें हुए हैं । ये ऐसे युद्ध हैं जिनमें गोलीबारी के सिवाय सब-कुछ (सारी बुराइयाँ युद्ध की ) होता है । “

आरवेल ने चालीस साल पहले जब यह लिखा तब उनके दिमाग में १९३६ के ओलिम्पिक खेल और कुछ अन्तरराष्ट्रीय फुटबाल मैच थे । तबसे खेलों में जिन बुराइयों की आरवेल ने चर्चा की है , वे कई गुना बढ़ गयी हैं । हिंसा तो खेल-कूद की अनिवार्य अंग बनती जा रही है । खिलाड़ियों से यह अपेक्षा की जाती है कि उनमें ’ किलर इन्स्टिंक्ट ’ होगी यानी जीतने के लिए प्रतिस्पर्धी खिलाड़ी को मार डालने तक की प्रवृत्ति । दर्शकों को तबतक पैसे वसूल होते नहीं दिखते जबतक उनको यह नहीं लगता कि खिलाड़ी उनका मनोरंजन करने के लिए ’पर और मार नहीं ’ रहे हैं । किसी खिलाड़ी के असफल रहने पर उसे धिक्कारा जाता है कि उसमें ’ किलर इन्स्टिंक्ट ’ ( ’हत्या करने की मूल प्रवृत्ति ’ ) नहीं है । ऐसे में खिलाड़ी अपने में ’किलर इन्स्टिंक्ट’ लाते हैं और जो बेचारे ला नहीं पाते वे दिखाने के लिए हिंसा का स्वांग करते हैं । इस तरह हिंसा बढ़ती ही जाती है । अब किसी भी तरह जीतना उद्देश्य बनता जाए तो यह होगा ही । खेलों से हिंसा का जो उन्माद बनता है वह नया है । जैसे नशेवान और ज्यादा नशा चाहता है , वैसे ही दर्शक खेल के मैदान में ज्यादा-से-ज्यादा हिंसा चाहता है ताकि उसका उन्माद बढ़े ।

( जारी )

अगली बार : खेल और व्यापार

January 16, 2010

क्या एशियाई खेल वास्तव में खेल हैं ? – अशोक सेक्सरिया

एशियाई खेलों को लेकर देश भर में जब भयंकर उन्माद फैलाया जा रहा है, तब यह प्रश्न उठाना कि यह खेल वास्तव में खेल हैं भी कि नहीं – मूर्खता लगता है । मूर्खता के डर से आदमी सोचना बंद कर देता है और उस पागलपन में शामिल हो जाता है जो सरकार , कम्पनियां और अखबार एशियाई खेलों को लेकर फैला रहे हैं । आखिर , हमारे जैसे गरीब और भिखमंगे देश में , जहाँ आधी आबादी गरीबी की रेखा के नीचे रह रही है और जिसकी सरकार ने हाल में अन्तर्राष्ट्रीय मुद्राकोष से रिरियाकर ५ हजार करोड़ रुपये का ऋण लिया हो , एक हजार करोड़ रुपये खरच कर खेलों का आयोजन करना पागलपन नहीं है तो और क्या है ? अगर पागलपन नहीं , तो फिर बीमार बच्चे या बीमार बाप की दवा पर न खरच कर टेलिविजन खरीदने पर खरचने – जैसी क्रूरता और कृतघ्नता है ।
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खेल उमंग की सहज अभिव्यक्ति है । उनका आदिरूप हम बच्चों में देखते हैं , वे हमेशा खेलते रहते हैं । अकेला बच्चा भी खेलता रहता है । हम देखते हैं कि कोई अकेला बच्चा , कुछ न मिला तो रास्ते पड़ी सिगरेट की डिबिया को ही ठोकर मारता या अपने पास की किसी चीज को उछालता और लपकता हुआ खेल की सृष्टि कर रहा है । एशियाई खेलों के स्टेडियम बनानेवाले मजदूरों के मरियल बच्चे भी , माँ – बाप के काम पर चले जाने पर , निश्चय ही खेलते होंगे ।
बच्चों के खेल में प्रतियोगिता के बजाय उमंग और आनंद की ही प्रधानता होती है । इस आनंद की एक छवि यहाँ रखते हैं -

” वह शहर का गंदा मुहल्ला था । उसकी संकरी गली से गुजरते ही लगता था , बदन की कमीज मैली हो गयी है । कहीं कोई थूक रहा था तो कोई मूत रहा था । मिठाई की दूकान में सजी हुई मठाइयां देखकर ही दिमाग में मक्खियां भिनभिनाने लगती थीं । गली के किनारे आते – जाते लोगों के बीच दो बच्चे लकड़ी की तख्तियों ( पटरों ) और प्लास्टिक की चिड़िया से आधे बैडमिन्टन और आधे टेबल -टेनिस जैसा कोई खेल खेल रहे थे । उनके बीच कोई जाल नहीं था । जाल की कल्पना उनके मन में थी । मैले और गन्दे होने के बावजूद खेलते हुए दोनों बड़े सुन्दर मालूम पड़ रहे थे । एक पल वह रुक गया और उनका खेल देखने लगा । उसने देखा कि वे खेल खेल रहे हैं , हार – जीत नहीं रहे हैं । दोनों अपनी तख्तियों से चिड़िया को इस तरह मार रहे हैं कि वह जमीन पर न गिरे । मिल – जुल कर खेल को साध रहे हैं लेकिन यह मिलना – जुलना ऐसा भी नहीं कि मिलीभगत हो जाए । एक बच्चा चिड़िया को इस तरह मारता था कि दूसरे बच्चे को उसे लौटाने में दिक्कत तो हो पर इतनी नहीं कि चिड़िया जमीन पर गिर जाये । उनका इरादा हारने – जीतने का नहीं था , खेल खेलने का था , सो वे बच्चे होने पर भी एक ऐसे संतुलन की तलाश में थे जिसमें थोड़ी चुनौती तो हो पर हार – जीत के बजाय आनन्द-ही-आनन्द हो । “

तो खेल का यही तत्व और सत्व है कि उसमें आनन्द हो , सहजता हो और ऊपर से थोपा गया कोई संगठन न हो । बच्चों के खेल में यदि उसे बड़े बिगाड़ न दें , यही तत्व रहता है । लेकिन आदमी सब समय तो बच्चा नहीं रहता , वह बड़ा हो जाता है ; पर उस सहज उमंग को खोना नहीं चाहता जिसे उसने बचपन में जाना था । इसीलिए वह खेलना चाहता है , अपने अंगों में थिरकन पैदा करना चाहता है ; लेकिन बच्चे की तरह खेल नहीं पाता , इसलिए वह ज्यादा-से-ज्यादा इस बात की कोशिश करता है कि बच्चे की तरह खेले । इस कोशिश में वह बचपन के सत्य को पुन: निर्मित करता है , इसीलिए उसका खेल अभिनय होता है ; पर इतना अभिनय भी नहीं कि खेल रह ही न जाए । बच्चों और बड़ों के खेल में यही सूक्ष्म अंतर है । खेल का संसार बड़ों के लिए उमंग – भरे अभिनय का संसार है , जिसके नियम , कायदे और कानून ऐसे नहीं हैं कि जिनसे उन्हें डर लगे । यह जीवन की जटिलताओं से मुक्ति का अहसास दिलाने वाला और प्रसन्न रखने वाला संसार है । इसमें तमगे नहीं हो सकते , हार-जीत नहीं हो सकती और न ही दो लाख मजदूरों के शोषण से निर्मित अश्लील वैभव ।

( जारी )

आगे : हिटलर और खेल

January 9, 2010

अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (६) : एक मकड़ा और मक्खी

इक दिन किसी मक्खी से यह कहने लगा मकड़ा

इस राह से होता है गुजर रोज तुम्हारा

लेकिन मेरी कुटिया की न जगी कभी किस्मत

भूले से कभी तुमने यहां पाँव न रखा

गैरों से न मिली तो कोई बात नहीं है

अपनों से मगर चाहिए यूं खिंच  के न रहना

आओ जो मेरे घर में , तो इज्जत है यह मेरी

वह सामने सीढ़ी है , जो मंजूर हो आना

मक्खी ने सुनी बात मकड़े की तो बोली

हज़रत किसी नादां को दीजिएगा ये धोखा

इस जाल में मक्खी कभी आने की नहीं है

जो आपकी सीढ़ी पे चढ़ा , फिर नहीं उतरा

मकड़े ने कहा वाह ! फ़रेबी मुझे समझे

तुम-सा कोई नादान ज़माने में न होगा

मंजूर तुम्हारी मुझे खातिर थी वगरना

कुछ फायदा अपना तो मेरा इसमें नहीं था

उड़ती हुई आई हो खुदा जाने कहाँ से

ठहरो जो मेरे घर में तो है इसमें बुरा क्या ?

इस घर में कई तुमको दिखाने की हैं चीजें,

बाहर से नजर आती है छोटी-सी यह कुटिया

लटके हुए दरवाजों पे बारीक हैं परदे

दीवारों को आईनों से है मैंने सजाया

मेहमानों के आराम को हाज़िर हैं बिछौने

हर शख़्स को सामाँ यह मयस्सर नहीं होता

मक्खी ने कहा , खैर यह सब ठीक है लेकिन

मैं आपके घर आऊँ , यह उम्मीद न रखना

इन नर्म बिछौनों से ख़ुदा मुझको बचाये

सो जाए कोई इनपे तो फिर उठ नहीं सकता

मकड़े ने कहा दिल में , सुनी बात जो उसकी

फाँसूँ इसे किस तरह , यह कमबख़्त है दाना

सौ काम खुशामद से निकलते हैं जहाँ में

देखो जिसे दुनिया में , खुशामद का है बन्दा

यह सोच के मक्खी से कहा उसने बड़ी बी !

अल्लाह ने बख़्शा है बड़ा आपको रुतबा

होती है उसे आपकी सूरत से मुहब्बत

हो जिसने कभी एक नज़र आपको देखा

आँखें हैं कि हीरे की चमकती हुई कनियाँ

सर आपका अल्लाह ने कलग़ी से सजाया

ये हुस्न,ये पोशाक,ये खूबी , ये सफ़ाई

फिर इस पे कयामत है यह उड़ते हुए गाना

अल्लामा इक़बालफिर इसपे क़यामत है यह उड़ते हुए गाना

मक्खी ने सुनी जब ये खुशामद , तो पसीजी

बोली कि नहीं आपसे मुझको कोई खटका

इनकार की आदत को समझती हूँ बुरा मैं

सच यह है कि दिल तोड़ना अच्छा नहीं होता

यह बात कही और उड़ी अपनी जगह से

पास आई तो मकड़े ने उछलकर उसे पकड़ा

भूका था कई रोज़ से , अब हाथ जो आई

आराम से घर बैठ के , मक्खी को उड़ाया

- अल्लामा इक़बाल

[ वगरना = नहीं तो , सामाँ = सामान ,  दाना = समझदार , कनियाँ = टुकड़े ]

January 5, 2010

अल्लामा इकबाल : बच्चों के लिए (५) : शहद की मक्खी

इस फूल पे बैठी , कभी उस फूल पे बैठी

बतलाओ तो, क्या ढूँढ़ती है शहद की मक्खी ?

क्यों आती है , क्या काम है गुलजार में उसका ?

ये बात जो समझाओ तो समझें तुम्हे दाना

चहकारते फिरते हैं जो गुलशन में परिन्दे

क्या शहद की मक्खी की मुलाकात है उनसे ?

आशिक है ये कुमरी की , कि बुलबुल की है शैदा ?

या खींच के लाता है इसे सैर का चसका ?

दिल बाग़ की कलियों से तो अटका नहीं इसका ?

भाता है इसे उनके चटखने का तमाशा ?

सबज़े से है कुछ काम कि मतलब है सबा से ?

या प्यार है गुलशन के परिन्दों की सदा से ?

भाता है इसे फूल पे बुलबुल का चहकना ?

या सरो पे बैठे हुए कुमरी का ये गाना ?

पैग़ाम कोई लाती है बुलबुल ज़बानी ?

या कहती है ये फूल के कानों में कहानी ?

क्यों बाग में आती है , ये बतलाओ तो जानें ?

क्या कहने को आती है , ये समझाओ तो जानें ?

बेवजह तो आख़िर कोई आना नहीं इसका

होशियार है मक्खी इसे गाफ़िल न समझना

बेसूद नहीं , बाग़ में इस शौक से उड़ना

कुछ खेल में ये वक़्त गँवाती नहीं अपना

करती नहीं कुछ काम अगर अक़्ल तुम्हारी

हम तुमको बताते हैं , सुनो बात हमारी

कहते हैं जिसे शहद , वह एक तरह का रस है

आवारा इसी चीज़ की ख़ातिर ये मगस है

रखा है ख़ुदा ने उसे फूलों में छुपाकर

मक्खी उसे ले जाती है छत्ते में उड़ाकर

हर फूल से ये चूसती फिरती है उसी को

ये काम  बड़ा है , इसे बेसूद न जानो

मक्खी ये नहीं है, कोई नेमत है ख़ुदा की

मिलता न हमें शहद , ये मक्खी जो न होती

इस शहद को फूलों से उड़ाती है ये मक्खी

इनसान की ये चीज़ ग़िज़ा भी है , दवा भी

कुव्वत है अगर इसमें तो है इसमें शिफ़ा भी

रखते हो अगर होश तो इस बात को समझो

तुम शहद की मक्खी की तरह इल्म को ढूँढ़ो

ये इल्म भी एक शहद है और शहद भी ऐसा

दुनिया में नहीं शहद कोई इससे मुसफ़्फ़ा

हर शहद से जो शहद है मीठा , वो यही है

करता है जो इनसान को दाना , वो यही है

ये अक़्ल के आईने को देता है सफ़ाई

ये शहद है इनसाँ की , वो मक्खी की कमाई

सच समझो तो इनसान की अजमता है इसी से

इस ख़ाक के पुतले को सँवारा है इसी ने

फूलों की तरह अपनी किताबों को समझना

चसका हो अगर तुमको भी कुछ इल्म के रस का

- अल्लामा इकबाल

[ गुलज़ार = गुलशन ; फुलवारी , दाना = अक़्लमंद ;होशियार , कुमरी= एक चिड़िया, शैदा = आशिक , सबा = सुबह की हवा ,सदा= अवाज़ , सरो = एक सीधा छतनार पेड़ ; वनझाऊ , बेसूद = बेफ़ायदा ; बेमक़सद , मगस = मक्खी;शहद की मक्खी ,शिफ़ा= तन्दुरस्ती ; रोग से मुक्ति, मुसफ़्फ़ा = साफ़ - सुथरा ; स्वच्छ , अजमता = बड़ाई ;महानता ]

December 28, 2009

शैशव पर हावी धर्म , न्याय, कट्टरपंथ और गूगल

” इस्लाम में धर्मान्तरण कैसे करें ? धर्मान्तरण करके मुसलिम बनने हेतु चैट द्वारा मदद लें”

एक शानदार खबर के शीर्षक के ठीक नीचे उपर्युक्त इश्तेहार दिया हुआ है । विज्ञापन एक संस्था का है और यह विज्ञापन गूगल द्वारा प्रसारित है । गूगल ने धर्म , धर्म कबूलना , हिन्दू , मुस्लिम, ईसाई जैसे शब्द पढ़कर  विज्ञापन लगा दिया होगा। धर्मान्तरण की बाबत स्वामी विवेकानन्द के विचार हमें याद रखने चाहिए । धर्म के तथाकथित अलम्बरदारों के गले न उतरने वाली बात कह गये हैं स्वामी विवेकानन्द ।

खबर से जुड़े़ युवा जोड़े को इस एक-लाईना इश्तेहार से जरूर कोफ़्त हुई होगी , यह और कोई समझे न समझे मैं समझ सकता हूँ । मेरे साथ भी गूगल ने ऐसी ही बेहूदगी की थी । मैंने कोका कोला द्वारा भू्मिगत जल – दोहन के खिलाफ़ बनारस में चल रहे आन्दोलन की रपट लिखी थी जो कई वेब साईट्स पर छपी थी । इस रिपोर्ट के साथ कोका कोला से जुड़े विज्ञापन गूगल ने नत्थी कर दिए थे । कितनी बड़ी नाइंसाफ़ी ? जब गूगल से पत्राचार किया तब उनकी नीति मुझे बता दी गयी । ’ चाहे तो अपनी मेल तथा अपनी साईट्स पर कोका कोला के विज्ञापन रोक सकते हैं । ’ लेकिन दूसरों की साइट्स द्वारा यह करवाना टेढ़ी खीर थी ।

बहरहाल , उपर्युक्त इश्तेहार कल छपी किस खबर से जुड़ा है ? यह जुड़ा है मुम्बई के वरसोवा में रहने वाले अदिति शेड्डे तथा उनके पति आलिफ़ सुर्ती के तीन माह के बेटे से  । अदिति और आलिफ़ को वृहन्मुम्बई नगर निगम से अपने बेटे का जन्म प्रमाण पत्र पाने में कितनी हुज्जत करनी पड़ी इसकी खबर है । यह दम्पति चाहते थे कि बेटे के जन्म प्रमाण पत्र में ’ धर्म ’ का कॉलम खाली हो ।   बच्चे के बारे में यह फैसला उन दोनों ने झटके-पटके में नहीं लिया था।  अदिति बताती है कि गर्भ धारण के कुछ माह बाद ही उन्होंने यह फैसला कर लिया था कि बच्चे पर किसी धर्म की पहचान हम नहीं थोपेंगे।

” हम किसी धर्म के खिलाफ़ नहीं हैं परन्तु अपने शिशु का धर्म तय करने वाले हम कौन होते हैं ? हम बालक को विभिन्न धर्मों के मूल्यों के बीच रखेंगे । जब वह बड़ा हो जाएगा तब वह कोई भी पंथ चुनने अथवा किसी भी पंथ को न चुनने के लिए आज़ाद होगा ।”

इस दम्पति का यह निर्णय विनोबा के विचार से मेल खाता है । उनका मानना था कि हाई स्कूल परीक्षा देने की उम्र तक पहुंचने के पहले बच्चों का कोई धर्म नहीं होना चाहिए । इस्लाम में भी धर्म आचरण सम्बन्धी नियम अबोध बच्चों पर लागू नहीं होते । इस मूल भावना को स्वीकार कर लेने पर राजस्थान के कई समूहों में जैसे गोद में बच्चों को लेकर बाल-विवाह बिना प्रशासन की रोक टोक के हजारों की संख्या में सम्पन्न किया जाते है। वैसा मुसलमान बच्चों के लिए भी हराम माना जाना चाहिए । दहेज उत्पीड़न रोकने के लिए बने कानून जैसे सभी धर्मावलम्बियों पर लागू होते हैं वैसे ही बाल-विवाह निरोधक कानून भी लागू होना चाहिए ।

परन्तु बच्चों और महिलाओं पर अमानवीय परम्पराओं को थोपने का ठीका सभी धर्मों के ठेकेदार लिए बैठे होते हैं । वे न बाल विवाह के खिलाफ़ कुछ करते हैं और सती प्रथा को भी धर्म और परम्परा के अनुसार बताते हैं । सती विरोधी कानून में सती का मन्दिर बनाना और उसकी पूजा करना भी जुर्म बताया गया है । बाल विवाह जैसी कुरीतियों को रोकने के लिए जब कानून लाया जा रहा था (शारदा एक्ट आदि) तब रा्ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गुरु गोलवलकर ने उसका विरोध किया था । सभी सामाजिक सुधार समाज की भीतर से आते हैं , ठेकेदार बनने वालों को उनसे खतरा होता है।

इसीलिए हम पाते हैं कि हमारे अन्दर का साम्प्रदायिक मानस दूसरे समुदाय के महिलाओं और बच्चों के प्रति अति संवेदनशील और मानवीय हो उठता है । वैसी संवेदनशीलता अपने समूह के महिलाओं और बच्चों के प्रति होने वाले परम्परागत अन्याय के प्रति इन तत्वों को कत्तई नहीं दिखती । बल्कि यही लोग उन सड़ी गली परम्पराओं के हक़ में खड़े हो जाते हैं । कई सामाजिक सर्वेक्षणों के अनुसार हिन्दुओं में बहुपत्नी का प्रमाण अब मुसलमानों से बढ़ गया है। मुस्लिम पर्सनल लॉ की छूट के बावजूद बहु पत्नी प्रथा समाप्त सी है । मुस्लिम समाज भी एक से अधिक पत्नी वाले पुरुषों को हेय दृष्टि से देखता है । क्या यह कल्पना की जा सकते हैं कि आर एस एस मुस्लिम महिलाओं और बच्चों को संगठित करने और सामाजिक परिवर्तन की दिशा में कुछ कर सकता है ? सवर्ण – अवर्ण विवाह करने वाले जोड़ों को सम्मानित करने की एक स्वस्थ परम्परा महाराष्ट्र जैसे प्रान्तों में समतावादी संगठनों द्वारा चलाई गई है । सामाजिक यथास्थिति बरकरार रखने वाली शक्तियां कभी भी जातिविहीन , स्त्री-पुरुष समता की दिशा में सक्रिय नहीं होतीं । कारण साफ़ है : उनके कल्पना का ’हिन्दू राष्ट्र’ जातिविहीन नहीं है । आज सामाजिक रूप से जो तबके ताकतवर हालत में हैं वे भी नहीं चाहेंगे कि उनकी इस शक्ति सम्पन्न हालत में कोई तब्दीली आवे इसलिए वे भी ऐसे लक्ष्य के प्रति अनुकूल होते हैं । कुछ दिनों पहले मुझसे एक पाठक ने पूछा था कि जनेऊ और फिरकापरस्ती का क्या सम्बन्ध है ?

युनिसेफ की ’विश्व के बच्चों की स्थिति : २००९’ के  अनुसार भारत में २०-२४ वर्ष की ४७ फीसदी महिलायें बाल-विवाह की उम्र मे (१८ से नीचे) विवाहित हुई थीं । इनमें ५६ फीसदी ग्रामीण इलाकों की थी । दुनिया भर के बाल विवाहों का ४० फीसदी भारत में होता है । (सन्दर्भ तालिका )

जन्म प्रमाणपत्र हासिल करना इतना आसान न था । अस्पताल प्रशासन को जब पता चला कि यह दोनों धर्म का कॉलम खाली छोड़ने वाले हैं तो उनके कान खड़े हो गये । हर अस्पताल को जन्म के १५ दिन के अन्दर वृहन्मुम्बई महानगर निगम को सूचना देनी पड़ती है जिसके आधार पर महानगर निगम जन्म प्रमापत्र जारी करता है । ” आपको महानगर निगम के अधिकारी से बतियाना पड़ेगा ।” अस्पताल के एक कर्मचारी ने उन्हें बताया ।
” चूंकि अदिति मराठी भाषी है इसलिए मैंने कॉर्पोरेशन वालों को फरियाने के लिए कहा ।” एक फिल्म निर्माण और वितरण कम्पनी के क्रिएटिव डाईरेक्टर आलिफ़ ने कहा । अदिति महानगर निगम के अंधेरी स्थित दफ़्तर में पहुंची ।
” क्या तुम्हें अपनी हिन्दू पहचान पर शर्म है ? तुम क्यों नहीं चाहती कि तुम्हारा बच्चा हिन्दू जाना जाए ? ” एक अफ़सर ने अदिति से उर्रठई से पूछा । अदिति ने पलटकर अफ़सर से कहा ,” मुझे अपनी हिन्दू पृष्टभूमि पर गर्व है परन्तु मैं हिन्दू धर्म का पालन नहीं करती । क्या धर्म निरपेक्ष , लोकतांत्रिक देश में अभिभावक अपने बच्चे का कोई धर्म न बताने का निर्णय नहीं ले सकते ?”
अफ़सर के गले यह बात नहीं उतरनी थी । उसने एक तकनीकी समस्या ( गूगल की श्रेणी की ) बताई । जन्म प्रमाणपत्र जिन मशीनों की मदद से निकलता है वह कोई भी कॉलम खाली रहने पर आवेदन खारिज कर देती है ।” अदिति के टस से मस न होने पर उसे एक ऊपर के अफ़सर के पास ले जाया गया। ” इस अफ़सर ने मुझे धैर्य पूर्वक सुना और कहा कि वह मेरी भावनाओं की कद्र करता है । उसने वही तकनीकी समस्या दोहरा दी लेकिन यह कहा कि मेरी पूरी नौकरी के दरमियान ऐसा निवेदन कभी नहीं किया गया । इस पर मैंने कहा कि हमेशा कोई न कोई तो प्रथम बनता ही है । “
बस, दम्पति निराश होने ही वाले थे । उक्त कॉलम को भरने के लिए उनके पास चार विकल्प थे – हिन्दू , मुस्लिम, ईसाई तथा अन्य । अदिति का कहना है कि ’अन्य’ में भी पहचान -विशेष  बताने की बात थी- अन्य कौन सा? वह अफ़सर से और बहसी लेकिन आखिरकार बिना ’अन्य’ का विवरण दिए ’अन्य’ भरने पर मान गयी । ” यह सिर्फ़ प्रमाण पत्र हासिल करने के लिए किया है,हमें पता है कि हमारे बच्चे का कोई धर्म नहीं है । “
इस फैसले तक पहुंचने की वजह वे दोनों अपनी उदार परवरिश को मानते हैं । अदिति कुवैत में बड़ी हुई थी जहाँ उसके कई सहपाठी मुस्लिम थे । उसे कुरान की कुछ आयतें भी कंठस्थ हो गई थीं ।

आबिद सुरती और नारायण देसाई

आलिफ़ प्रसिद्ध लेखक कार्टूनिस्ट (डब्बूजी के जनक) आबिद सुर्ती के पुत्र हैं । ओशो रजनीश , अटल बिहारी वाजपेयी और अमिताभ बच्चन को आबिद भाई अपना प्रशंसक बताते हैं (डब्बूजी के कारण)। ७५ वर्षीय आबिद कहते हैं , ” अपने दोनों बच्चों पर कोई धार्मिक पहचान थोपने का विचार मैंने कभी नहीं किया । मैं बिना धर्म के जिक्र के उनका जन्म प्रमाणपत्र हासिल करने में विफल रहा। मैं खुश हूँ कि मेरे बेटे और बहु ने इसमें कामयाबी हासिल की है । “

सम्बन्धित खबरें , पोस्ट तथा लेख जिनके आधार पर लिखा गया है :

१. आलिफ़-अदिति के बेटे के धर्म सम्बन्धी खबर: टाईम्स ऑफ़ इंडिया

२. स्त्री-पुरुष समता और निजी कानून : डॉ. स्वाति (२) , (३)

३. भारत में बाल-विवाह पर तथ्य : अंग्रेजी विकीपीडिया

४.  ईसाई और मुसलमान क्यों बनते हैं – स्वामी विवेकानन्द

५. राष्ट्र की रीढ़ : स्वामी विवेकानन्द

६. सती-प्रथा पर भारतीयतावादियों से कुछ सवाल : किशन पटनायक

७. रामायण की सती अयोध्या में नहीं लंका में है : किशन पटनायक

८. विकृतियों से लड़कर नई भारतीयता का सृजन करेंगे : किशन पटनायक

९. हिन्दू बनाम हिन्दू : राममनोहर लोहिया