सफरनामा ३ : हैदराबाद – पुणे

हैदराबाद – पुणे रेल मार्ग पर यह मेरा पहला सफ़र था , इसलिए लाजमी तौर पर मन में थोड़ा उत्साह भी था | गाड़ी रात की थी इसलिए  सुबह सिर्फ शोलापुर से पुणे का रेल मार्ग देख पाया | हैंडलूम की विशिष्ट बुनाई वाली खेसनुमा चादरों के लिए मशहूर – शोलापुर | महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री शिंदे साहब का चुनाव क्षेत्र | पटरी के पास लिखे नारों में शिंदे साहब के कारण क्षेत्र के गौरव और महत्त्व को ही उभारा गया था| सुबह टहलने के समय पर ही गाड़ी में भी नींद खुल गयी थी | प्लैटफोर्म साफ़ – सुथरे थे |
संगमनेर पुणे और नासिक रोड के बीच सड़क मार्ग पर स्थित एक छोटा क़स्बा है |संगमनेर अहमदनगर जिले में शिवाजी के जन्मस्थान और साईं बाबा वाली शिरडी के करीब है|  हमें भी पुणे से ही बस पकड़नी थी | यहीं हमारे दल समाजवादी जनपरिषद की राष्ट्रीय समिति की तीन दिवसीय बैठक थी| चुनाव के बाद होने वाली पहली बैठक थी इसलिए चुनाव समीक्षा और राजनीतिक प्रस्ताव पर महत्वपूर्ण चर्चा होनी थी | बस पकड़ने के पहले हमें महाराष्ट्र के वरिष्ट समाजवादी भाई वैद्य से मिलना था| भाई हमारे दल के संस्थापक महासचिव थे | उत्साह भर देने वाले संगठनकर्ता – अस्सी वर्ष की अवस्था में भी अथक सक्रिय | पुणे के नगर प्रमुख और महाराष्ट्र के गृह राज्य मंत्री रह चुके भाई गोआ – मुक्ति सत्याग्रह के सैनिक थे | मुख्यधारा की राजनीति के किसी भी दल में उन्हें योग्य स्थान मिल सकता था लेकिन उन्होंने देश भर में सक्रिय कई संगठनों के युवाओं और किशन पटनायक जैसे समतावादी चिन्तक के साथ नई राजनैतिक संस्कृति की स्थापना के लिए इस नए दल को तरजीह देना उचित समझा | हम चार मेहमानों को अपने कांपते हाथों से परोस कर खिलाने का उनका प्रेमपूर्ण आग्रह था,जो पूरा किया गया | अपनी पुत्र – वधु के लिए वे ‘बहु -बेटी ‘ कह रहे थे – प्रेम से पगा संबोधन | वे हमारे लिए खाना बनवा कर इंजीनियरिन्ग महाविद्यालय में पढाने गयी हुई थीं | घुटने में तकलीफ के बावजूद भाई हमारे १७ साल पुराने दल के सबसे सक्रीय महामंत्री थे , फिर साने गुरूजी द्वारा स्थापित राष्ट्र सेवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे | आज कल देश भर में ‘समाजवादी शिक्षक सभा’ के माध्यम से स्कूल स्तर तक समान और नि:शुल्क तालीम के लिए अभियान की रहनुमाई कर रहे हैं | माँ – बाप की पीढी के राजनैतिक कर्मियों से भी कितनी प्रेरणा मिलती है |

स्वाति भाई वैद्य के साथ दल के राष्ट्रीय पदाधिकारियों की टीम में थी इसलिए पुणे में भाई से मिले बगैर जाने का प्रश्न ही नहीं था | मुझे पुणे में आगा खान महल स्थित स्मारक जाने का मन होगा यह जानते हुए स्वाति ने मुझसे वहां जाने के बारे में पूछा | ‘अंग्रेजों भारत छोडो – करो या मरो ‘ के अगस्त क्रान्ति के आवाहन के बाद गांधीजी मुंबई से गिरफ्तार कर पुणे के आगा खान महल में नजरबंद रखे गए थे |उनके सचिव महादेव देसाई भी उनके साथ गिरफ्तार किए गए थे | गिरफ्तारी के ६ दिन बाद गांधीजी द्वारा अनशन की संभावना के तनाव में हृदयाघात से १५ अगस्त १९४२ को महादेव देसाई की एक कैदी के रूप में मौत हुई थी | गांधीजी ने उनकी अंतिम क्रिया की थी | करीब साल भर बाद कस्तूरबा की भी वहीं मृत्यु हुई | इन दोनों लोगों की समाधियों के अलावा अब उस ‘महल’ को राष्ट्रीय स्मारक का रूप दिया गया है | महादेव देसाई मेरे दादा भी थे | भाई वैद्य से बरसों बाद मिलकर मुझे कम संतुष्टि नहीं मिली | स्कूल पूरा करने के बाद एक बार मैं दादाजी की समाधि देखने गया था |

सफरनामा : एक , दो

सफ़रनामा (२) : सागर नाहर

मैंने जब हिन्दी में ब्लॉगिंग शुरु की उस समय से इस समय की कुछ दशा ही और है ! वैचारिक मतभेद तब भी थे लेकिन गोलबन्दियों के खाँचे खिड़कियों की गुंजाईश लिए हुए थे । एक बार सागर नाहर ने चिट्ठेकारी बन्द करने की घोषणा की लेकिन अनूप शुकुल के समझाने पर मान भी गए थे।

सिकन्दराबाद में अपने बूते एक नया व्यवसाय शुरु करने और उसे अच्छी तरह जमाने में सागर ने जो काबीलियत लगायी वह काबिले तारीफ़ है । यानि राजस्थान और गुजरात में गुजारे बचपन और किशोरावस्था से अलग एक परिवेश में एक नई तकनीक से जुड़ा व्यवसाय चुनने का जोख़िम उठाया – अपना साइबर कैफ़े खोलकर । तरुणाई का एक अहम लक्षण जोख़िम उठाने का साहस भी तो है !

नौजवानी का एक अन्य लक्षण अपने से पहले वाली पीढ़ी के जीवन मूल्यों को आँखें मूँद कर स्वीकार न करने में भी प्रकट होता है । सन्त विनोबा , लोकनायक जयप्रकाश नारायण , गोकुलभाई भट्ट और सिद्धराजजी जैसे दिग्गज गाँधीजनों का सानिध्य पाए सागर नाहर के पिता आदरणीय श्री शांतिचन्द्रजी नाहर राजस्थान के राजसमद क्षेत्र के प्रमुख खादी कार्यकर्ता रहे हैं । सागर ने अपने कैफ़े से मेरी उनसे फोन पर बात करवाई । श्री शांतिचन्द्रजी ने बताया कि राजस्थान के दौरे पर एक बार जब जेपी आए हुए थे तब वे किसी शॉर्ट हैन्ड जानने वाले को खोज रहे थे । श्री शांतिचन्द्रजी ने कहा कि मैं शॉर्ट हैन्ड नहीं जानता लेकिन प्रयास करूंगा । सामग्री जब जेपी के समक्ष प्रस्तुत की गयी तब उन्होंने पीठ थपथपाई । सागर की लिखावट भी इतनी सुन्दर है कि टाइप किए हुए से सुन्दर लगती है । उसकी लिखावट देखकर स्कूल में अच्छी लिखावट के लिए पुरस्कार देने की शुरुआत की गई । पीढ़ियों के बीच जीवन मूल्यों के फरक का उल्लेख कर दूँ। पिछले साल श्री सुरेश चिपलूणकर जब हैदराबाद पधारे थे तब उभयजनों की रुचि-अनुरूप नाथूराम गोड़से के भाई गोपाल गोड़से की लिखी किताब ’गाँधी – वध क्यों ?’ सागर को भेंट कर गये थे ।

सागर को हिन्दी फिल्म संगीत सुनने और संग्रह करने में गहरी रुचि है । जब भी  हजारों गीतों का कोई संग्रह उनके हाथ लगता है तो सागर उसे ’खजाने’ की संज्ञा देते हैं । ऐसे कई खजानों के साथ सागर गीतों का सागर जुटा चुके हैं । फिर ऐसे खजाने और सागर जुटाने वाले कई लोगों से सागर की मैत्री भी गहरी है ।

सागर नाहर

सागर नाहर

सागर के खजाने में सिर्फ़ गीत नहीं हैं । गाँधी द्वारा दक्षिण भारत में राष्ट्रभाषा के प्रचार के उद्देश्य से बनाई समिति की हैदराबाद इकाई द्वारा किसी स्पर्धा में पारितोषिक के रूप में किसी महिला को तीसरे या चौथे दशक में कभी दी गयी मुंशी प्रेमचन्द की कहानियों के संग्रह की एक जर्जर प्रति ! सागर ने एक रद्दी-पस्ती खरीदने वाली दुकान से उसे हासिल किया है । सागर मुझसे अच्छी गुजराती जानते हैं । ’बाराहा” अपने कम्प्यूटर पर चढ़ाने के बाद मैं कभी कभी सागर से गुजराती में चैटिया कर उससे गुजराती जानने की हूं-कारी भरवाता रहा हूँ । सागर का गुजराती-प्रेम भी गजब है । गुजरात से आये ’केसर आम’ यदि गुज्जू – अखबार में पैक हों तो उस पृष्ट को भी सागर संभाल कर रख लेते हैं पढ़ने के लिए ।

हैदराबाद से छपने वाले हिन्दी अखबार(शायद ’मिलाप”) में सागर लिखते रहते हैं । मैंने उन्हें बताया कि लोहिया के भाषण और किताबें भी यहीं छपती थी । स्व. बद्रीविशाल पित्ती द्वारा। हैदराबाद के हिन्दी अखबार में सागर ने पित्तीजी के बारे में पढ़ रखा था । उत्तराखण्ड की किसी वादी में लोहिया ने जब हुसैन को लैण्डस्केप बनाते देखा था तब उनसे कहा था कि इस मुल्क के मानस में राम-कृष्ण-शिव की कहानियाँ अंकित हैं , उन्हें अपना विषय बनाओ । हुसैन की महाभारत और रामायण की श्रृंखला की नुमाईश पहले पहल हैदराबाद की सड़कों और गलियों में साइकिल रिक्शों पर सजा कर दिखाई गयी थी ।

लोहिया की साँस्कृतिक और सियासी चेतना से लैस साहित्यिक पत्रिका ’कल्पना’ , दल के मुखपत्र जन और मैनकाईण्ड भी हैदराबाद से छपते थे तब सच्चिदानन्द सिन्हा ,किशन पटनायक,ओमप्रकाश दीपक,अशोक सेक्सरिया जैसे उनके साथी भी इसी शहर में रहते ।

हैदराबाद में मेरे परस्पर विलोमी विचार वाले दो मित्र – लाल्टू और सागर दोनों पिछले दिनों हुए चुनावों में आन्ध्र प्रदेश के एक नये दल से प्रभावित हुए थे । यह दल है नई राजनैतिक संस्कृति स्थापित करने के प्रमुख घोषित मकसद से बनी लोक सत्ता पार्टी । संस्थापक हैं पूर्व नौकरशाह जयप्रकाश नारायण । आन्ध्र विधान सभा की एक सीट यह दल जीता है । इस सीट पर  स्वयं जयप्रकाश नारायण जीते हैं । उनके कार्यकर्ता तेलुगु और अंग्रेजी में परचे ले कर जब सागर नाहर के कैफ़े में चुनाव के दरमियान आये थे तब उनसे हिन्दी में भी परचे छापने की माँग सागर ने की थी ।

आरक्षित सफ़र और असुरक्षित संस्थान

दक्षिण में दोनों प्रकार के आरक्षण के प्रति चेतना अधिक है । नौकरियों में अधिक पहले से आरक्षण होने के कारण दोनों प्रकारों के आरक्षण के प्रति परिपक्वता भी लाजमी तौर पर वहाँ अधिक है । आरक्षण के दो प्रकारों से मेरा आशय नौकरियों तथा रेल के आरक्षण से है । उत्तर में आम तौर पर रेल के आरक्षण के पक्षधरों के गले नौकरियों में आरक्षण नहीं उतरता था । बनारस – पटना से चेन्नै – बंगलुरु – हैदराबाद जाने वाली गाड़ियों में  दो महीने पहले कराये गये आरक्षण में आप प्रतिक्षा सूची में पहले – दूसरे नम्बर पर ही क्यों न रहे हों , गाड़ी छूटने के वक्त तक यथास्थिति के बरकरार रहने की संभावना ही ज्यादा रहती है । इस परिस्थितिवश हैदराबाद से शुरु होने वाली यात्रा को दो दिन टालना पड़ा तथा भारतीय अभियांत्रिकी सेवा में फँसे एक प्रिय मित्र की मदद लेनी पड़ी ।

हैदराबाद स्थित इन्टर्नैशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ इनफ़ॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी में बायो इन्फ़ॉर्मैटिक्स में शोध के लिए मेरी पत्नी डॉ . स्वाति को पाँच महीने रहना है । कभी जिला मुख्यालय बनाने के लिए चुनी गयी इस जगह पर कुछ सरकारी भवन बन भी चुके थे परन्तु खुद को सूबे का मख्य मन्त्री के बजाए सूबे का सी.ई.ओ. कहलाना पसंद करने वाले चन्द्राबाबू नायड़ू ने इसे निजी क्षेत्र के इस उच्च शिक्षण शोध संस्थान को बनाने के लिए सौंप दिया था । इस संस्थान के परिसर के एक बड़े हिस्से में एक डीनॉसॉर-सी लम्बी – चौड़ी इमारत का कंकाल खड़ा था । सत्यम इन्फ़ो के मालिकान जब से जेल प्रवास में हैं तब से निर्माण कार्य बन्द है ! उनके चन्दे से इसे बनना था ।

बहरहाल , कानपुर आई.आई.टी. के ’मजदूर-किसान-नीति” से जुड़े जो युवा बाद में ’पीपल्स पैट्रियॉटिक साइंस  एण्ड टेक्नॉलॉजी’ तथा ’लोक-विद्या” से जुड़े , उनमें से एक प्रमुख वैज्ञानिक – प्रोफ़ेसर अभिजीत मित्रा और कवि-चिट्ठेकार प्रोफ़ेसर हरजिन्दर सिंह उर्फ़ लाल्टू इसी संस्थान में सेवारत-शोधरत हैं। विदेशों से पीएच.डी के बाद भारत लौटने की इच्छा रखने वाले कई युवा इस संस्थान में बतौर शिक्षक जुड़े हैं – संस्थान की यह एक सकारात्मक उपलब्धि है ।

हैदराबाद के संगीत प्रेमी चिट्ठेकार सागर नाहर से मुझे मिलना था । उस बाबत अपने गीतों वाले चिट्ठे ’आगाज़’ पर लिखना उचित रहेगा ।

चलते वक्त लाल्टू की कहानियों का संग्रह ’घुघनी’ और उनकी सुन्दर लिखावट में १४ कवितायें पाईं ।

चुनाव में मीडिया की संदिग्ध भूमिका पर ऑनलाईन प्रतिवेदन पर हस्ताक्षर करें

( सिटिज़न्स न्यूज सर्विस से साभार । आशा परिवार के बॉबी रमाकान्त द्वारा प्रस्तुत ऑनलाईन प्रतिवेदन (अंग्रेजी में) पर हिन्दी में टिप्पणी सहित सहमति दें

हम नागरिक, लोक सभा चुनाव २००९ के दौरान राजनीतिक पार्टियों एवं चुनाव प्रत्याशियों द्वारा किये गए मीडिया के दुरूपयोग से, बहुत चिंतित हैं. हमें इस बात से भी आपत्ति है कि मीडिया ने अपना दुरूपयोग होने दिया है. यह पाठक के उस मूल विश्वास को तोड़ता है जिसके आधार पर निष्पक्ष एवं संतुलित खबर पढ़ने के लिए पाठक पैसा दे कर समाचार पत्र खरीदता है. मीडिया को लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ के रूप में माना गया है परन्तु मीडिया के द्वारा प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया की चुनाव के दौरान पत्रकारिता हेतु मार्गनिर्देश (१९९६) के निरंतर होते उल्लंघन ने उसकी लोकतंत्र में सकारात्मक भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

समाचार, विचार और प्रचार के बीच भेद ही नहीं रह गया है. पाठक को यह बताने के लिए कि प्रकाशित सामग्री समाचार, विचार या चुनाव प्रचार है, छोटे अक्षरों में ‘ए.डी.वी.टी’ या ‘मार्केटिंग मीडिया इनिशिएटिव’ छापना पर्याप्त नहीं है. कुछ समाचार पत्र तो यह भी छापने का कष्ट नहीं उठाते हैं.

मोटे तौर पर कहा जाए तो खबर से सम्बंधित निर्णय लेने में संपादक की भूमिका पर अब मार्केटिंग वाले सहकर्मी हावी हो रहे हैं. छोटे जिलों या शहर-नगर-कस्बों में तो अक्सर जो व्यक्ति संवाददाता होता है उसी को विज्ञापन इकठ्ठा करने की जिम्मेदारी भी दे दी जाती है, जिसके फलस्वरूप वो विज्ञापन-दाताओं की खबर को महत्व देता है और अक्सर विज्ञापन न देने वाले लोगों की खबर को नज़रंदाज़ कर देता है.

विज्ञापन, ‘विज्ञापन-जैसे-संपादकीय’, ‘मार्केटिंग मीडिया इनिशिएटिव‘ और अन्य ऐसे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष तरीकों से जो खबर मीडिया में आती है, उसपर हुआ व्यय, अक्सर चुनाव आयोग द्वारा तय की गई २५ लाख रूपये के अधिकतम चुनाव खर्च सीमा से, अधिक होता है. इसलिए मीडिया अब इन प्रत्याशियों की मिलीभगत से चुनाव के दौरान लागू आचार संहिता का उलंघन कर रही है.

मीडिया में छप रहे विज्ञापनों, विज्ञापन-जैसी-ख़बरों आदि पर हुए पूरे व्यय निर्वाचन अधिकारीयों को नहीं दिए जाते हैं. मीडिया को यह रपट देनी चाहिए जिससे यह पता चल सके कि किस राजनीतिक पार्टी ने और किस चुनाव प्रत्याशी ने मीडिया पर कितना व्यय किया है.

राजनीतिक पार्टियों के संचालन हेतु कोई भी कानून नहीं है, ऐसा कानून बनना चाहिए। चुनाव में अधिकतम खर्च-सीमा के उलंघन की सज़ा भी अधिक सख्त होनी चाहिए और मौजूदा चुनाव में ही लागू होनी चाहिए. वर्त्तमान में चुनाव में अधिकतम-खर्च सीमा के उलंघन की सज़ा सिर्फ़ अगले चुनाव में ही लागू होती है, जो पर्याप्त अंकुश नहीं है.

इलेक्ट्रोनिक मीडिया (टीवी) के लिए भी प्रेस काउंसिल ऑफ़ इंडिया जैसी नियामक संस्था होनी चाहिए।

समाचार पत्रों को ‘ओम्बुड्समैन’ या विश्वसनीय लोकपाल नियुक्त करने के लिए देश-भर में उठ रही मांग का हम समर्थन करते हैं।

मूल रूप से हम नागरिक यह चाहते है कि मीडिया लोकतंत्र में निगरानी करने वाली निष्पक्ष भूमिका को पुन: ग्रहण करे. आर्थिक स्वार्थ के लिए मीडिया को अपनी स्वायत्ता को दाव पर नहीं लगानी चाहिए. जब लोगों का लोकतान्त्रिक संस्थाओं में विश्वास उठ रहा हो, तो मीडिया को इस पतन में शामिल होने के बजाय, लोकतंत्र में नागरिकों के विश्वास को पुनर्स्थापित करना चाहिए.

वर्डप्रेस पर मेरे तीन चिट्ठों के आँकड़े

वर्डप्रेस पर मेरे तीन चिट्ठे हैं : समाजवादी जनपरिषद ,   यही है वह जगह

तथा   शैशव |   तीनों पर कुल ५१७ पोस्ट लिखी हैं ,  कुल २२१३ टिप्पणियाँ की गई हैं तथा इन्हें कुल ७६,७९७ बार देखा गया है ।  इस प्रकार औसतन प्रति पोस्ट मात्र ४.२८ टिप्पणियाँ मिली हैं तथा प्रति पोस्ट औसतन १४८.५४ बार ही चिट्ठों को देखा गया है ।  औसत आंकड़े  सूरत-ए-हाल का बहुत ढंग का बयान नहीं पेश करते ।

तीनों चिट्ठों पर सर्वाधिक व्यस्त दिन ( ट्रैफिक के लिहाज से) : समाजवादी जनपरिषद पर ३९१  ,  यही है वह जगह पर १७० तथा शैशव पर १५१ रहे हैं । प्रथम दोनों चिट्ठों पर व्यस्ततम दिन भड़ास फॉर मीडिया नामक पोर्टल पर मेरी पोस्ट के उल्लेख वाले दिन रहे हैं। इनमें से दो मीडिया सम्बन्धी  आलेख थे ।

सर्च इंजनों पर ढेर सारे शब्दों को खोजते हुए भी पाठक इन चिट्ठों पर पहुंचते हैं । इसका मुझे सन्तोष है । सर्च इंजनों पर खोजे गये उन पदों-शब्दों-नामों पर मेरे चिट्ठों से पाठकों को कुछ न कुछ सूचना मिलती होगी । हांलाकि इन से कहीं अधिक पाठक एग्रीगेटर्स , अन्य ब्लॉगों , वेब साइटों तथा पोर्टलों पर दिए गए इन चिट्ठों की कड़ियों से पहुंचते हैं ।

मेरे प्रिय एग्रीगेटर ब्लॉगवाणी के प्रिय संचालक मैथिली जी कहते हैं कि आगे आने वाले समय में चिट्ठेकारों के समूहों , समुदायों की भूमिका बढ़ेगी ।

वर्डप्रेस के चिट्ठों में आपके चिट्ठों से जुड़े नाना प्रकार के आँकड़े बिना किसी अतिरिक्त एड ऑन के उपलब्ध होते हैं । यह चिट्ठे मुक्त स्रोत भी हैं । मुझे वर्डप्रेस इसीलिए पसन्द है ।

‘कई के नाम में राम है लेकिन् वास्ता दूर् तक नहीं’

पीलीभीत से भाजपा प्रत्याशी वरुण गांधी का औपचारिक नाम फिरोज वरुण गांधी होने की चर्चा मैंने कल ही की थी । इस पोस्ट को उम्मीद से ज्यादा ’टीपें’ मिल गयी ।

एक विचारधारा विशेष के विद्वान ने कहा है -

उदहारण के लिए कई के नाम में राम है लेकिन वास्ता दूर तक नहीं…!

नाम में जिनके राम है उनका राम मन्दिर से दूर का वास्ता नहीं रहा है – यह भारतीय समाज का कितना कटु यथार्थ है ! उत्तर भारत की शूद्र जातियों में नाम के पीछे राम लगाने की परम्परा रही है। जैसे जगजीवन राम , कांशी राम । अपने नाम के साथ राम को जोड़े रखने वाले इन तबकों को लम्बे समय तक मन्दिरों में प्रवेश की मनाही थी । इनके मन्दिरों के पुजारी या महन्त होने की बात तो बहुत दूर की कौड़ी है ।

बहरहाल , तुलसीदास ’अधम ते अधम , अधम अति नारी’- शबरी को राम द्वारा कैसे आश्वस्त किया गया यह इस संवाद द्वारा बताते हैं :

शबरी : केहि विधि अस्तुति करहु तुम्हारी,अधम जाति मैं जड़मति धारी ।

अधम ते अधम अधम अति नारी , तिन्हिमय मैं मति-मन्द अधारी ॥

राम :     कह रघुपति सुनु धामिनी बाता , मानहु एक भगति कर नाता ।

जाति – पाति कुल धर्म बड़ाई , धनबल परिजन गुन चतुराई ।

भगतिहीन नर सोहे कैसा , बिनु जल वारिधी देखी जैसा ॥

अपने नाम के साथ राम को लगा कर रखने वालों के भक्ति के नाते को नकारने वालों को इनका ’वास्ता दूर तक नहीं’ दिखाई देगा । गोस्वामी तुलसीदास की इन पंक्तियों से ऐसे समूह को विशेष परेशानी रहती है :

परहित सरिस धरम नहि भाई , परपीड़ा सम नहि अधमाई ।

अधम -दर्शन पालन करने वाले इन लोगों के बारे में इसलिए कहना पड़ता है :

लेते हैं ये राम का नाम ,करते हैं रावण का काम ।


वरुण् का नाम् फिरोज् वरुण् गांधी

लोकसभा के भाजपा उम्मीदवार वरुण गांधी का मतदाता सूची में नाम है- फिरोज वरुण गांधी । फिरोज वरुण गांधी के नाम से ही उन्हें चुनाव आयोग की नोटिस दी गई है । चुनाव आयोग की साइट पर २२.०३.२००९ को उन्हें  नोटिस इसी नाम से जारी हुई है । उक्त पृष्ट पर EC News के तहत नोटिस पढ़ी जा सकती है । वरुण के बाबा फिरोज एक अच्छे सांसद थे । उनका कुछ असर शेष बचा रहे ।

चिट्ठे की प्रविष्टी ‘वर्ड’ पर कैसे चेपें?

    कई बार चिट्ठों पर छपी प्रविष्टियों को ‘वर्ड’ (माइक्रोसॉफ़्ट ऑफ़िस वर्ड) पर चेपने , छापने की जरूरत होती है ।  मामूली सी जानकारियों के अभाव में ‘वर्ड’ पर चिपकाने के बाद आप पाते हैं कि वह देवनागरी लिपि में लिखी हिन्दी के बजाए कोई विचित्र सी लिपि और भाषा प्रकट हो गई है ।

चिट्ठों पर छपी सामग्री ‘यूनिकोड’ आधारित होती है तथा ‘वर्ड’ के पृष्ट पर चेपते वक्त यदि फ़ॉन्ट का चयन सही (यूनिकोड आधारित)  नहीं हुआ तब विचित्र अक्षर दिखते हैं।

‘वर्ड’ के दस्तावेज के रूप में चिट्ठे की सामग्री चेपते वक्त ऊपरी बाँए कोने पर सही फॉन्ट चुनें । हिन्दी के चिट्ठों की तरह Mangal एवं Arial Unicode MS  भी यूनिकोड आधारित हैं इसलिए इनमें से किसी  फॉन्ट को चुनने पर आप ‘विचित्र’ सामग्री नहीं पायेंगे अपितु पठनीय सामग्री पायेंगे ।

 ’वर्ड’ का दस्तावेज आप ऑफ़लाइन  भी तैयार कर सकते हैं । हिन्दी चिट्ठों की प्रविष्टियों के लिए ‘वर्ड’ पर सामग्री बिना नेट से जुड़े (ऑफ़लाइन) तैयार करनी हो तब भी आप को Mangal अथवा Arial Unicode MS चुनना होगा ।

इन्टरनेट के किसी पृष्ट को बचा कर रखने (save) में  कम्प्यूटर का कहीं ज्यादा स्थान जाया होता है ।

गूगल की तख्ती

    किसी साइबर कैफे से हिन्दी में पोस्ट करने की नौबत आ जाए , जहां हिन्दी में लिखने की सुविधा ना हो | तब आप क्या उपाय करते हैं ? पूरी पोस्ट न लिखनी हो , सिर्फ टीपना हो | ब्लोगर    वाले चिट्ठेकार सीधे देवनागरी में लिखते होंगे | ऐसा न होने पर , निश्चित ही आप किसी ‘तख्ती’ किस्म की सुविधा का इस्तेमाल करते होंगे | मैं अंकित जैन की तख्ती का प्रयोग करता हूं | रोमन में लिखी टिप्पणियों को देख कर थोड़ी सी कोफ्त जरूर होती है अथवा लिखने वाले की मजबूरी का ख्याल आ जाता है |

    आज पता चला की गूगल की भी तख्ती उपलब्ध है | बाराहा की भांति गूगल ने भी कुछ अन्य भारतीय भाषाओं में भी यह सुविधा मुहैय्या कराई है | इस तख्ती का प्रयोग करने के उपरांत आप इसे छाप भी सकते हैं (  प्रिंट आउट भी हासिल कर सकते हैं ) | नेट पर हिन्दी के बढ़ रहे प्रयोग की वजह से गूगल को यह सुविधा देनी पडी , मुझे लगता है | आप को कैसी लगी यह तख्ती ?

यह पोस्ट उक्त  साधन   के प्रयोग से लिखी गयी है |

होली का मर्म

अपने आप को धर्म और भगवान से ऊँचा मानने वाला हिरण्यकश्यप नाम का एक राजा था। वह चाहता था कि सब लोग उसे ही भगवान मानें और उसकी पूजा करें । पर हिरण्यकश्यप के पुत्र ने उसे भगवान मानने से साफ इनकार कर दिया । बहुत यातना व अत्याचार के बाद भी वह वह स्वयंभू अपने पुत्र भक्त प्रह्लाद से अपने को भगवान कहलाने में असफल रहा । हार कर अन्त में उसने प्रह्लाद को जान से मारने का तरीका सोचा ।

हिरण्यकश्यप की एक होलिका नाम की बहन थी ।होलिका के पास एक अग्निरोधक वरदान वाला शॉल था ।वरदान के अनुसार यदि वह शाल ओढ़ कर आग में बैठेगी तो आग उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगी । हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन से कहा कि वह प्रह्लाद को गोद में ले कर चिता पर बैठ जाए । होलिका ने अपने भाई का कहना माना और प्रह्लाद को गोद में ले कर चिता पर बैठ गयी । लेकिन जब चिता जली तो लपटों में होलिका का शॉल उड़ गया । होलिका जल मरी,पर भक्त प्रह्लाद का बाल बाँका नहीं हुआ।

प्रतिवर्ष होली जला कर हम इसी घटना का स्मरण करते हैं । होलिका दहन कर हिरण्यकश्यप की कुटिल चाल को नाकाम करते हैं। भक्त प्रह्लाद को जिन्दा रखते हैं।

होली का मर्म

आज भगवान को अपनी छुद्र राजनीति का जरिया बना कर धर्म के तथाकथित संरक्षक बन बैठे एक नहीं अनेक हिरण्यकश्यप सारे देश में घूम-घूमकर खून की होली खेल रहे हैं ।

अपने विश्वास को संविधान , कानून , राष्ट्र और जनता से ऊपर समझने वाले ये हिरण्यकश्यप देश की , जनता की एकता , सद्भावना,परस्पर विश्वास और लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर कुठाराघात कर रहे हैं । अपनी बहन होलिका रूपी साम्प्रदायिकता के माध्यम से कई निर्दोष और मासूमों को अपना शिकार बना रहे हैं ।

जो व्यक्ति या संगठन इनके विचारों से असहमति रखते हैं उन्हें सबक सिखाना,डराना,धमकाना ,मार-पीट करना,सभा बिगाड़ना,पुतला जलाना और अन्त में दमन करना,हत्या करना इन हिरण्यकश्यपों की दृष्टि में पवित्र धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है ।

धर्म और भगवान के ठेकेदार बने स्वयंभू हिरण्यकश्यपों और साम्प्रदायिकता रूपी होलिका को ठिकाने लगाना ही होली का सच्चा मर्म है ।

लकड़ियों के बड़े ढेर में आग लगा कर तो हम खत्म हो रहे जंगलों के विनाश में भागीदार बनते हैं , पर्यावरण असंतुलन के गुनहगार बनते हैं । अत: होली का मर्म समझ कर कम-से-कम लकड़ेयाँ जला कर प्रतीकात्मक होलिका दहन करें ।

- समता संगठन ,पिपरिया,होशंगाबाद,(म.प्र.)

(पु्नर्प्रकाशन )

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  • दुनिया के आर्थिक संकट को कैसे समझें ? – लेखक सुनील May 11, 2009
    यह लूट, लालच, भोग की सभ्यता का संकट है। Technorati tags: recession, global economic crisis, sunil, samajwadi janaparishad, capitalism, usa, china, india (1) दुनिया का आर्थिक संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है। अमरीका के जिस दोयम कर्ज (सब प्राइम लोन) संकट से यह शुरु हुआ, उसको 19 महीने बीत चुके है। निवेश बैंक नाम की [...] […]

RSS समाजवादी जनपरिषद

  • शिक्षा अधिकार विधेयक एक छलावा है July 1, 2009
    एक आह्वान शिक्षा अधिकार विधेयक एक छलावा है, शिक्षा का बाजारीकरण एक विकृति है, देश के सारे बच्चों को मुफ्त, समतापूर्ण, गुणवत्तापू्र्ण शिक्षा के संघर्ष के लिए आगे आएं लोकसभा चुनाव में दुबारा जीतकर आने के बाद संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के नए मानव संसाधन विकास मंत्री श्री कपिल सिब्बल ने कई घोषणाएं की हैं। अपने मंत्रालय का 100 दिन [...] […]
  • बेतूल : महिला अत्याचार रपट : शिउली वनजा July 1, 2009
    म.प्र. का बैतूल जिला पुलिस द्वारा महिलाओं पर अत्याचार के लिए प्रसिद्ध होता जा रहा है। बीते दिनों बैतूल जिले में एक सप्ताह के अंदर दो घटनाएं घटी। पहले 27 मई को सारणी में निजी सुरक्षा गार्डों द्वारा महिलाओं के साथ छेड़खानी का विरोध होने पर गोली चलाकर एक आदिवासी युवक की [...] […]
  • कांग्रेस के झूठ को पहचानना जरूरी है May 16, 2009
    जब बुनियादी सवालों पर प्रमुख दलों में वैचारिक अन्तर न रह गया हो तब हार – जीत के नकली कारण प्रकट होने लगते हैं । उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की आशा से अधिक सफलता से प्रफुल्लित मनमोहन सिंह से लगायत छुटभैय्ये कांग्रेसी और उनकी मस्केबाजी करने वाले टेवि चर्चाकार बेशर्मी से [...] […]
  • नर – नारी समता और निजी कानून (३) , ईसाई और पुर्तगाली कानून : ले. डॉ. स्वाति May 13, 2009
  • नर-नारी समता और निजी कानून (२) : ले. डॉ. स्वाति May 12, 2009
    पिछला भाग – एक हिंदु विवाह अधिनियम (1955 ) सतही तौर पर ’समता’ पर आधारित है । वह अदालत से तलाक मांगने का अधिकार स्त्री-पुरुष दोनों को देता है । 1976 के अधिनियम में तलाक के साधारण स्थापित कारकों के अलावा , क्रूरता (मानसिक/शारीरिक ), परित्याग करना व परस्पर रजामंदी भी तलाक के लिए पर्याप्त [...] […]
  • नर – नारी समता और निजी कानून : डॉ. स्वाति May 11, 2009
    [ वरिष्ट अधिवक्ता एवं लोकप्रिय चिट्ठेकार दिनेशराय द्विवेदी ने कल सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक नि:संतान हिन्दू विधवा द्वारा अर्जित सम्पत्ति पर विवाह के तीन माह बाद गुजर गये पति के वारिसों का हक मुकर्रर करने के फैसले का विवरण अपने चिट्ठे पर दिया था । दिनेशजी ने उक्त पोस्ट में फैसले की बारीकियों को अत्यन्त [...] […]
  • सूअर – ज्वर या सभ्यता – ज्वर ? (2) ले. सुनील May 9, 2009
    पिछले हिस्से से आगे ए. काकबर्न नामक विद्वान ने दुनिया के मांस-इतिहास पर एक पेपर लिखा है, जिसमें संयुक्त राज्य अमरीका के एक प्रमुख सूअर-मांस उत्पादक राज्य उत्तरी केरोलीना के बारे में बताया है- “बदबूदार खाडियों के चारों और सूअरों के अंधेरे गोदाम बने हुए है, जिनमें उन्हें धातु के कटघरों में रखा जाता है जो उनके [...] […]